Monday, 3 November 2025

कांग्रेस के पिछलग्गू मुसलमानों और राहुल गांधी से कुछ कड़वी बातें




सबसे पहले बतादूं कि मैं इमरान नियाज़ी किसी भी राजनैतिक दल या नेता का सपोर्टर नहीं हूं। और ना ही हर खद्दर धारी का व्यक्तिगत विरोधी हूं। हां कुछेक नाम हैं जिनका में हर तरह से विरोधी हूं। मैं केवल पार्टियों और नेताओं की करतूतों के खिलाफ़ हूं। हांलाकि मुझसे हमेशा ही सवाल पूछा जाता है कि मुसलमान होकर भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के मुखालफ़त क्यों करता हूं तो जनाब मैं मुसलमान हूं इसीलिये तो इन दोनों की खुली मुखालफ़त करता हूं। खैर फिलहाल मैं बात कर रहा हूं कांग्रेस की। मुसलमानों ने 1947 से ही कांग्रेस पर भरोसा किया। लेकिन कांग्रेस ने 1947 में ही मुसलमानों की पीठ में छुरा घोंपा। ब्रिटिश के जाने के बाद ही देश में सरकार बनाने की जोड़गांठ शुरू हो गई थी। उस वक्त दो बड़े चेहरे प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए सामने थे, जवाहर लाल नेहरू और मो0 अली जिन्ना। जवाहरलाल नेहरू खुद बड़े बेरिस्टर थे। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस कमेटी की मीटिंग हुई, मीटिंग में सभी गेर मुस्लिम कांग्रेसियों ने प्रस्ताव पास किया कि ‘‘देश के प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री की कुर्सी किसी मुसलमान को नहीं दी जायेगी।’’ हालांकि महात्मा गांधी चाहते थे कि मुसलमान को प्रधानमंत्राी बनाया जाये। महात्मा गांधी के कत्ल की वजह भी यही थी। साथ ही देश के बंटवारे की असल वजह भी कांग्रेस कमेटी का यह फैसला ही था। देश बंट गया और बंटवारे का ठीकरा मो0 अली जिन्ना के सिर फोड़ दिया गया। जवाहर लाल की कोशिश कामयाब हुई कांग्रेस की सरकार बना ली गई उस वक्त भी करोड़ों मुसलमानों ने मो0 अली जिन्ना के मुकाबले नेहरू का साथ दिया। कांग्रेस ने मुसलमानों का ब्रेन वॉश करके मुसलमानों को मानसिक गुलाम बना लिया। सरकार बनते ही कांग्रेस ने अपना असल रूप दिखाना शुरू कर दिया। सितम्बर 1948 में नेहरू ने निज़ाम हैदराबाद पर फौज से हमला कराकर हज़ारों बेकसूर मुसलमानों का क़त्लेआम कराया। मुसलमान मानसिक गुलामी की जंजीरों में ऐसा जकड़ा हुआ था कि इतने बड़े क़त्लेआम के बाद भी कांग्रेस की दरी बिछाने से बाज़ नहीं आया। कांग्रेस ने शुरू से ही मुसलमानों को वोट के लिए इस्तेमाल किया। कभी लीडर शिप या बराबरी देने या मुसलमानों की शैक्षिक या माली तरक़्क़ी के लिए कुछ नहीं किया। कहीं ना आरक्षण ना कोई विंग ही बनाई। आर्मी में गोरखा रेजीमेन्ट बनाई, सिख रेजीमेन्ट बनाई, जाट रेजीमेन्ट, अहीर रेजीमेन्ट आदि बनाई। लेकिन कभी खान रेजीमेन्ट, पठान रेजीमेन्ट या कोई भी मुस्लिम रेजीमेन्ट बनाने की भूल नहीं की क्योंकि कांग्रेस मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछवाने और वोट के लिए इस्तेमाल करती हैं। कांग्रेस से सीख लेकर समाजवादी पार्टी, बीएसपी, जनता दल, सरीखे फ़र्ज़ी सैकूलरों ने भी मुसलमानों को दरी बिछाने के काम में इस्तेमाल किया। खैर दूसरे दलों की बात बाद में करेंगे फिलहाल कांग्रेस की करतूतों पर ही बात करते हैं।


1948-49 में हैदराबाद क़त्लेआम कराये जाने के लिए ना तो ब्रिटिश भारत आये ना ही यह क़त्लेआम आम जनमानस ने किया बल्कि नेहरू सरकार की आर्मी ने किया था,  26 से 40  हज़ार मुसलमानों का क़त्लेआम किया गया। मानसिक गुलामी में जकड़े मुसलमान की आंखें नहीं खुलीं और ज्यों का त्यों कांग्रेस की पिछलग्गू बनकर दरी बिछाता रहा।

1957 में तमिल नाडू के रामनाड में 50 से ज़्यादा मुसलमानों को मारा काटा गया। इस दौरान तमिलनाडू में के कामाराज की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में नेहरू की सरकार थी।

1964 में कलकत्ता में मुस्लिम क़त्लेआम किया गया इस वक्त पश्चिमी बंगाल में बिधन चन्द्र राय की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में गुलज़ारी लाल नन्दा और फिर लाल बहादुर शास्त्री की सरकार थी। मुसलमानों को सरकार से कोई राहत या मदद नहीं मिली, उल्टे जेलों में ठूंसा गया।

1964 में ही महाराष्ट्र के भिवंडी में मुसलमानों का क़त्लेआम किया गया। जब भी महाराष्ट्र में बसन्तराव नाइक और केन्द्र में इन्दिरा गांधी प्रधान मंत्री थीं।

1967 में रांची में 150 से ज़्यादा में मुसलमानों को मारा गयाए सैकड़ों दुकानों घरों को लूटकर आग लगाई गई। इस दौरान राज्य में जनता क्रान्ति दल (वर्तमान में बीजेपी) की सरकार ओर केन्द्र में मुसलमानों की मसीहा इन्दिरा गांधी की क़ब्ज़ा था।

1969 में गुजरात में 512 मुस्लिमों को काटा गया। इस दौरान गुजरात में हितेन्द्र कन्हैया लाल देसाई की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में मुसलमानों की मसीहाई का ढोल पीटने वाली इन्दिरा गांधी की सरकार थी।

1970 में महाराष्ट्र के भिवंडी में कई हज़ार मुसलमानों को मारा काटा गया। इस दोरान भी महाराष्ट्र में बसन्तराव नाइक की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में इन्दिरा गांधी की सरकार थी।

1980 में उ0प्र0 के मुरादाबाद में एक बड़ी साजिश के तहत ईदगाह में सुअर छोड़े गये, विरोध करने पर नमाज़ पढ़ रहे मुसलमानों पर पीएसी ने अंधाधुन गोलिया बरसाईं, लगभग 500 बूढ़े बच्चों जवानों का क़त्लेआम किया। इसके बाद पुलिस पीएसी ने मुसलमानों के घरों में लूटपाट आगज़नी, कत्लेआम और बलात्कार किये। इस दौरान उ0प्र0 में कांग्रेसी मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह और केन्द्र में इन्दिरागांधी की सरकार थी।

1981 में बिहार में 50 से ज़्यादा मुस्लिमों को काटा गया। इस दौरान बिहार में कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगननाथ मिश्रा और केन्द्र में इन्दिरा गांधी का कब्ज़ा था।

1983 में आसाम में मुसलमानों पर हमले किये गये और मार काट की गई, 3 हज़ार से ज़्यादा बेकसूर निहत्थे मुसलमानों का क़तलेआम किया गया। आसाम में भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया और केन्द्र में इन्दिरा  गांधी की सरकार थी।

1984 में फिर महाराष्ट्र के भिवन्डी में मुस्लिमों को मारने काटने लूटने का खुला आंतक कराया गया, 300 से ज़्यादा मुसलमानों को क़त्ल किया। इस बार महाराष्ट्र में वसन्त दाद पाटिल की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में राजीव गांधी की सरकार थी।

1984 में इन्दिरा गांधी के क़त्ल के बाद पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश दिल्ली और बिहार आदि में सिखों के साथ कांग्रेसियों ने दर्जनों मुसलमानों को भी निशाना बनाया।

1985 की फरवरी, अप्रैल और मई में गुजरात में 300 से ज़्यादा मुसलमानों को क़त्ल किया गया। इस बार भी गुजरात में माधव सिंह सोलंकी की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में राजीव गांधी की सरकार थी।

1986 फरवरी की 01 तारीख को राजीव गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) ने बाबरी मस्जिद शहीद कराने की नींव रखते हुए मस्जिद के ताले खोलकर मस्जिद में मूर्तियां रखवा दीं।

1986 में कश्मीर में मुसलमानों के खिलाफ सरकारी और गैर सरकारी बवाल किया गया, दर्जनों बेकसूर मुसलमानों को सरकारी हाथों के ज़रिये मौत के घाट उतारा गया। इस दौरान राजीव गांधी की सरकार थी।

1987 में उ0प्र0 के मेरठ में लगभग 200 मुसलमानों पर आतंक बरपाया गया, 40 मुस्लिम नौजवानों को घरों से ले जाकर पुलिस ने नहर पर गोलियों से भून कर मार दिया था। इस समय उ0प्र0 में वीर बहादुर सिंह की कांग्रेसी सरकार थी और केन्द्र में मुस्लिमों के आक़ा राजीव गांधी का कब्ज़ा था।

1987 में ही दिल्ली में दर्जनों मुसलमानों पर आफत ढाई गई। इस दौरान दिल्ली पुलिस राजीव गांधी के ही कमान में थी।

1988 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद में दर्जनों मुसलमानों की मार काट की गई। इस दौरान महाराष्ट्र में कांग्रेसी शरद पवार की और केन्द्र में राजीव गांधी की सरकार थी।

1988 में ही उ0प्र0 के मुज़फफरनगर में कई दर्जन मुसलमानों की मार काट, आगज़नी, लूटपाट की गई। हज़ारों मुसलमों को लूटपाट करके उनके ज़मीनें घर छीने गये। तब भी उ0प्र0 में कांग्रेस की वीर बहादुर सिंह सरकार और केन्द्र में राजीव गांधी पावर में थे।

1989 में बम्बई में एक बार फिर मुसलमानों पर हमले किये गये और दर्जन भर से ज़्यादा मुसलमानों को क़त्ल किया गया। इस बार भी शरद पवार की ही पुलिस थी, राजीव गांधी सैन्ट्रल गर्वंमेन्ट चला रहे थे।

1989 में ही राजस्थान के कोटा में मुसलमानों की मार काट लूटपाट की गई, दो दर्जन से अधिक मुसलमानों को क़त्ल किया गया। उस वक्त राजस्थान में भी कांग्रेस की हरिदेव जोशी की और केन्द्र में राजीव सरकार थी।

1989 में ही उ0प्र0 के बदायूं में मुसलमानों पर हमले किये गये जाने ली गई मारकूट और लूटपाट की गई, दो दर्जन से अधिक मुसलमानों को कत्ल किया गया। उ0प्र0 में नारायण दत्त तिवारी और सैन्टर में राजीव गांधी की कांग्रेसी सरकार थी।

1989 में मध्य प्रदेश के इंदौर में मुसलमानों पर हमले किये गये, दो दर्जन मुसलमानों को मार दिया गया। इस दौरान मध्य प्रदेश में मोतीलाल वोरा की कांग्रेसी सरकार और केन्द्र में राजीव गांधी की कब्ज़ा था।

1989 में बिहार के भागलपुर में मुसलमानों पर आतंक बरपाया गया, 1000 से ज़्यादा मुसलमानों का क़त्लेआम किया गया। इन दिनों बिहार कांग्रेसी मुख्यमंत्री सत्यनरायण सिन्हा और केन्द्र में राजीव गांधी का कब्ज़ा था।

1989 में कश्मीर में 1200 मुसलमानों को साजिशी कत्लेआम किया गया।

1990 में उत्तर प्रदेश के कर्नल गंज में मुसलमानों पर हमले किये गये, 100 से ज़्यादा बेकसूर निहत्थे मुसलमानों को कत्ल किया गया। इस दौरान उत्तर प्रदेश की सत्ता कथित मुस्लिम हिमायती मुलायम सिंह यादव की और केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार थी।

1990 में हैदराबाद में मुसलमानों पर हमले किये गये, 200 से ज़्यादा मुसलमान कत्ल किये गये। इस दौरान आंध्र प्रदेश में मैरी चन्ना रेड्डी की कांग्रेसी सरकार थी।

1990 में मुलायम सिंह सरकार के रहते हुए उ0प्र0 के कानपुर, आगरा, खुरजा, अलीगढ़, गोण्डा में प्लानिंग के साथ मुसलमानों पर हमले करके 200 से ज़्यादा मुसलमानों को क़त्ल किया गया। लूट पाट आगज़नी की गई।

1990 में कर्नाटक के रामनगरम, चन्नापटना, कोलार, देवानागर, टुमकेर आदि में 50 से ज़्यादा मुसलमानों की मार  दिया गया। इस दौरान कर्नाटक में देवेन्द्र पाटिल कांग्रेसी मुख्य मंत्री की सरकार थी।

1991 में सहारनपुर में कम से कम 40, कानपुर में लगभग 20, मेरठ में 3 दर्जन, मुसलमानों को एक साथ कत्ल किया गया। सहारनपुर, कानपुर और मेरठ में क़त्लेआम के दौरान उ0प्र0 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्राी थे। जबकि केन्द्र में तथा कथित कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव का खेल चल रहा था।

1992 में बिहार के सीतामढ़ी में अचानक मुसलमानों पर हमले करके लगभग 65 मुसलमानों का क़त्लेआम किया गया। इस दौरान बिहार में लालूप्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे और वही नरसिम्हाराव राव का खेल चल रहा था।

1992 में एक बार फिर गुजरात के सूरत में आतंक मचाकर 200 से ज़्यादा निहत्थे बूढ़े बच्चे जवान मुसलमानों का क़त्लेआम कराया गया। हालांकि इन दिनों गुजरात में मोदी का कब्जा था। हालांकि लालू यादव ने अपनी इस गल्ती का प्रायचित रेलमंत्री बनाये जाने पर कर लिया। लेकिन केन्द्र में नरसिम्हाराव की साजिश थी।

1992 में ही बम्बई में मुसलमानों पर आतंक बरपाकर 250 से अधिक मुसलमानों को क़त्ल किया गया। इस दौरान महाराष्ट्र में कांग्रेस की ही सरकार थी और केन्द्र में नरसिम्हाराव की साजिशें चल रही थीं।

1992 में ही दोबारा गुजरात के सूरत में मुसलमानों पर आतंक वरपाकर 200 से ज्यादा मुसलमनों को कत्ल करके लूटपाट आगज़नी आबरू ज़नी कराई गई। अस बार भी केन्द्र में साजिशों का दौर था।

1992 में कर्नाटक के हुबली, बैंगलौर, गुलबर्गा, धारवाद में मुसलमानों पर हमले करके कम से कम 32 मुसलमानों को क़त्ल करा गया। कर्नाटक में भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीरप्पा मोईली और केन्द्र में साजिश का प्रतीक नरसिम्हाराव का खेल चल रहा था।

1992 में उ0प्र0 के कानपुर में फिर मुसलमानों पर हमले करके कत्लेआम करने की छूट देकर कम से कम 260 मुसलमानों को कत्ल कराया गया। इस बार भी मुसलमानों के खिलाफ नरसिम्हाराव का ही खेल था कयोंकि इस दौरान उ0प्र0 में राष्ट्रपति शासन था।

1992 में आसाम में फिर मुसलमानों पर कमले कराकर कम से कम 95 बेकसूर मुसलमानों को कत्ल कराया गया। इस दौरान आसाम में हितेश्वर सैकिया की कांग्रेसी सरकार थी साथ ही नरसिम्हाराव का खेल भी चल रहा था।

1992 में राजस्थान में भी मुसलमानों को काटने के लाईसेंस देकर लगभग 65 मुसलमानों को कत्ल कराया गया। इस दौरान राजस्थान में बीजेपी का कब्ज़ा था लेकिन केन्द्र में नरसिम्हाराव की कार गुजारी भी थी।

1992 में बंगाल के कलकत्ता में कम से कम 35 बेकसूर मुसलमानों का कत्ल किया गया। इन दिनों बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी के ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे लेकिन केन्द्र में कांग्रेस का ही कब्ज़ा था।

1992 में मध्य प्रदेश के भोपाल में मुसलमानों का क़त्लेआम करने की खुली छूट देकर 180 से ज़्यादा मुसलमानों के क़त्ल कराये गये। इन दिनो मध्य प्रदेश नरसिम्हाराव के हाथ में ही था।

1992 में दिल्ली में भी लगभग 55 मुसलमानों को मार दिया गया। इस दौरान दिल्ली सीधे नरसिम्हाराव की कमाण्ड में थी।

1993 में बम्बई में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सुधाकर राव नाईक ने मुसलमानों को थोक में क़त्ल करने का लाईसेंस देकर कम से कम 4500 मुसलमानों को क़त्ल कराया, सुधाकर राव को दिल्ली से नरसिम्हाराव की फुल सपोर्ट मिली थी।

1994 में कर्नाटक के हुबली में 7-8 बेकसूर मुसलमानों को मार दिया गया। इस दौरान कर्नाटक में वीरप्पा मोईली और केन्द्र में नरसिम्हाराव कांग्रेसियों का क़ब्ज़ा था।

1994 में ही कर्नाअक के बेंगलूर में दोनो कांग्रेसियों की कारगुजत्रारी से लगभग 25 मुसलमानों को क़त्ल किया गया।

2005 में उ0प्र0 के मऊ में मुलायम सिंह यादव की सरकार के दौरान 15 मुसलमान मौत के घाट उतारे गये। इस दौरान भी केन्द्र में कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार थी।

2005 में ही यूपी के लखनऊ में 5 मुसलमानों को कत्ल किया गया। इस दौरान भी यूपी में मुसलमानों के मसीहा मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और सैन्टर में सोनिया गांधी रिमोट से चलने वाली मनमोहन सिंह सरकार थी।

2006 में गुजरात के बड़ौदा में फिर मुसलमानों को मारने काटने लूटने आगज़नी करने की छूट देकर 10 कत्ल कराये गये। इस समय अगर गुजरात में सरकारी तौर पर मुसलमानों के कत्ल कराये जाने का प्रावधान था लेकिन केन्द्र में तो कांग्रेस का ही कब्ज़ा था।

2008 में मध्य प्रदेश के इंदौर में शिवराज सरकार के सरपरस्ती में मुसलमानों पर आतंक बरपाया गया। इसपर भी सोनिया गांधी नामक रिमोट से चलने वाली मनमोहन सिंह सरकार ने चुपी साधे रखी।

2012 में आसाम में मुसलमानों पर आतंकी हमले करके कम से कम 80 निहत्थे मुसलमानों का कत्लेआम कराया गया। इस दौरान आसाम में तरून गोगोई और सैन्अर में मनमोहन सिंह की कांग्रेसी सरकार थी।

2013 पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को बदनाम करने और कमज़ोर करने के लिए मुसलमानों पर हमले कराये गये, कई लोग मार दिये गये। सैन्टर में कांग्रेसियों का कब्ज़ा था।

2013 में उ0प्र0 के मुज़फ़्फरनगर में मुसलमानों के क़त्ल, रेप, लूटपाट, आगज़नी, सम्पत्ति कबज़ाने की छूट देकर लगभग 600 बेकसूर मुसलमानों को क़त्ल, आगज़नी, बलात्कार, लूटपाट, कराकर मुसलमनों की ज़मीनों मकानों पर कब्जे करके 60 हज़ार से अधिक मुसलमानों को घर ज़मीन जायदादें छोड़कर भागने पर मजबूर कराया गया। चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस दौरान उ0प्र0 में मुसलमानों के मसीहा अखिलेश भैया की सरकार और दूसरे नाखुदा राहुल गांधी का केन्द्र में कब्ज़ा था।


इनके अलावा अगर बात करें फ़र्ज़ी एंकाऊण्टरों के ज़रिये मुसलमानों को क़त्ल कराये जाने की तो कांग्रेस ने अपने दौर में थोक में बेकसूर मुसलमानों के एंकाउटर कराये गये। हम सिर्फ कुछ सरकारी कत्लों की बात करें तो 26 नवम्बर 2005 को गुजरात में सोहराब उददीन और उनकी पत्नी को मार दिया गया इन हत्याओं के चश्मदीद प्रजापति को भी 26 दिसम्बर 2006 को मार दिया गया। 15 जून 2004 को इशरत जहां और उसके दोस्तों को कत्ल किया गया। 19 सितम्बर 2008 को बाटला हाऊस कत्लों से भी सब वाकिफ हैं। और इन सब क़त्लों के दौरान केन्द्र में सोनिया गांधी नाम के रिमोट से चलने वाली कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार थी। मनमोहन सिंह सरकार को कोई कार्यवाही करने की इजाज़त नहीं दी गई। आज देश जो कुछ भुगत रहा है ये सब कांग्रेस की ही देन है। कांग्रेस बोये और सींचे पेड़ के ही फल देश को मिल रहे हैं। बीजेपी तो बेवजह ही बदनाम है। कांग्रेस ने जो फसल बोई औरं सींची थी उसी पकी फसल को बीजेपी काट रही है।

        कांग्रेस फिर मुसलमान के सहारे सरकार में पहुंचने की कोशिशों में लगी है। मुसलमान फिर पिछलग्गू बना दिख रहा है। कैसे बार बार भूल जाता है मुसलमान कांग्रेस की करतूतों को ? क्या मुसलमान का ज़मीर पूरी तरह मर चुका है ?

मुसलमानों को आंखे खोलनी होंगी, दिमागी गुलामी से बाहर आकर सोचना होगा, और यह देखना समझना होगा कि आज तक कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बीएसपी, समेत सभी सैक्यूलर का ढोंग करने वाली पार्टियों ने आपको दिया क्या ?

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Monday, 4 December 2023

 


2004-05 के कर्मो का सज़ा भुगत रही है कांग्रेस -इमरान नियाज़ी



1948 से 2014 के बीच लगातार 59 साल 07 दिन तक देश की सरकारों पर कब्ज़ा जमाये रखने वाली कांग्रेस। 1048 से ही मुसलमानों के बल बूते सरकारों में कांग्रेस का कब्जा जमा रहा। लेकिन कांग्रेस ने मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ धोका ही दिया। 1947 से ही देश का मुसलमान कांग्रेस का पटटा पहनकर पालतू बना रहा। 1948 से 1978 तक कांग्रेस ने अपने पालतुओं को सिर्फ दरी बिछवाने और नारे लगवाने के काम में लिया। कभी सरकार में हिस्सेदारी देने या सरकारी नौकरियों में रिजर्वेशन देने की भूल नहीं की। 1948 से कांग्रेस ने कई रेजीमेन्ट का गठन किया, लेकिन भूलकर भी मुस्लिम रेजीमेन्ट जैसी इकाई का गठन नहीं किया। 70 के दशक में इन्दिरा गांधी ने मुसलमानों की आबादी कन्ट्रौल करने के लिए जबरन नसबन्दी का खेल शुरू किया। इसके जवाब में 1978 के आम चुनाव में खुद इन्दिरा गांधी की जमानत भी ज़ब्त हो गई। इन्दिरा गांधी ने घड़ियाली आंसू बहाये और बरेली के एक दाढ़ी वाले को एमएलसी की कुर्सी और मोटी रक़म के बदल कांग्रेस का पटटा पहनाकर मुस्लिम को बड़गलाने के काम पर लगा दिया, साथ ही खुद भी मुसलमानों के सामने घड़ियाली आंसू बहाये। अमन पसन्द कौम ने इन्दिरा गांधी पर एक बार फिर यकीन कर लिया और इन्दिरा गांधी को वापिस सत्ता तक पहुंचा दिया। सत्ता में वापिस आते ही कांग्रेस ने भस्मासुर बनने में वक्त नहीं लगाया और 1980 में यूपी के मुरादाबाद में पीएसी /पुलिस के हाथों मुसलमानों का ना सिर्फ कत्लेआम कराया बल्कि मुसलमानों के घरों को और आबरूओं तक को लुटवाया। इन्दिरा गांधी के कत्ल के बाद राजीव गांधी को कब्जा मिलते ही राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद में मूर्ती रखवाई पुजा शुरू करादी। नतीजा यह कि राजीव गांधी को भी सड़क पर पहुंचा दिया। इस दौरान राजीव गांधी की दर्दनाक मोत के चलते एक बार फिर मुसलमानों को कांग्रेस पर दया आ गई और लगभग 15 साल बाइ 2004 में एक बार फिर कांग्रेस को सत्ता में पहुंचा दिया, मुसलमानों को लगा कि पन्द्रह साल तक बेरोज़गार फिरने से शायद सोनिया राहुल प्रियंका में कुछ सुधार आया होगा। लेकिन यह मुसलमानों की सबसे बड़ी भूल थी। लेकिन इस बार सोनिया गांधी के रिमाट से चलने वाली कांग्रेस सरकार ने अहसान फरामोशी की सारी हदें तोड़ दी। गुजरात आतंक से गदगद हुई कांग्रेस ने सरकार में पहुंचते ही एक साल के अन्दर ही गुजरात आतंक के मास्टर माइण्ड को ना सिर्फ सम्मानित किया पुरूस्कार दिये बल्कि ‘‘नानावटी आयोग’’ की रिपोर्ट को ही दफना दिया।

यह और बात है कि कुछ मुर्दा ज़मीर मुसलमान आज भी राहुल के ही उपासक बने हुए हैं, लेकिन इनकी हेसियत नहीं कि राहुल गांधी को प्रधान मंत्री बनवा सकें। क्योंकि बेकसूरों का खून रंग तो लाता ही रहेगा।

Tuesday, 18 July 2023

पूरी तरह प्री प्लान्टेड है ‘‘सीमा सचिन तमाशे की स्क्रिप्ट’’ - इमरान नियाज़ी



 

देश की पालतू मीडिया के साथ ही मोबाइल मीडिया भी पाकिस्तानी बताई जा रही सीमा नामक महिला और उसके आशिक की प्रेम गाथा में लीन नज़र आ रही है। इन नफरत जिहादियों की गुलाटियां मारने की दो खास वजह हैं। पहली यह कि महिला को मुसलमान बताया जाना और दूसरा पाकिस्तानी बताया जाना,। नफरत जिहादियों का मानसिक सन्तुलन बिगड़ने के लिए इतना ही काफी है। तमाम पालतू चैनलों पर मुजरे शुरू हो गये। सब इस तरह से उसकी वीर गाथा सुनाकर देश को किसी दलदल में ढकेलने की कोशिश की जा रही है कि मानो वह अपने परिवार देश से गददारी करके भाग कर नहीं आई बल्कि वीरता का कोई बड़ा एवार्ड जीत कर लाई हो। हमे शक ही नहीं बल्कि यक़ीन है कि ‘‘यह सब ड्रामा रचा जा रहा है 2024 लोकसभा चुनाव सिर पर है। यह बात हम इस लिए कह रहे हैं कि ‘‘यह महिला खास तौर से पाकिस्तान के खिलाफ बोलने के साथ ही यह भी बोल रही है कि उसे पाकिस्तान से धमकियां मिल रही हैं। 

दरअसल सारा मामला अच्छे से सोच समझकर तैयार किया गया लगता है। हो सकता है 2024 लोकसभा चुनावों की बुनियाद रखी गई हो। हमारा यह शक इसलिए मजबूती पर है कि क्योकि पालतू मीडिया यानी अफवाह जिहादियों के गैंग ने अपना काम शुरू कर दिया है। पालतू मीडिया का नफरत जिहादी गैंग पुरी ताकत के साथ इस भगोड़ी महिला के नाम के सहारे देश के हिन्दू समाज को भड़काने में लगा गया है। देश को बताया जा रहा है कि सीमा की वजह से पाकिस्तान में मन्दिारों पर हमले किये जा रहे है। दरअसल  अफवाह जिहादियों का ये गेंग ना सिर्फ पुलिस की आईटी सेल का पालतू है बल्कि प्रेस कौंसिल का भी पालतू है। अफवाह जिहादियों की इस अफवाह को देख कर हमने इन्टरनेट खंगाला। तब पाया कि अगस्त 2021 के बाद से आजतक पाकिस्तान में इस तरह की कोई घटना नहीं घटी।

महिला जो स्क्रिप्टेड कहानी सुना रही है वो किसी भी तरह गले नहीं ऊतर रही। महिला कहानी में कहती है कि ‘‘वह चार बच्चों के साथ पहले पाकिस्तान से शारजाह गई फिर शारजाह से नेपाल पहुंची, फिर नेपाल से भारत में घुस आई।’’ हालांकि यह बच्चों को अपना बता रही है, कोई गारन्टी नहीं कि बच्चे इसी के हैं। 

यह अपना नाम ‘‘सीमा हैदर’’ और उम्र 27 साल बता रही है। सिर्फ पांचवी पास बता रही है, लेकिन फर्राटे के साथ इंग्लिश और हिन्दी बोल रही है। इसको कम्पूटर की भी खासी जानकारी है। इसकी बात चीत में बिलकुल भी पाकिस्तानी अंदाज़ नहीं आता। अजीब बात है कि जहां पली बड़ी, आधी उम्र गुज़ारी वहां की भाषा और अन्दाज़ अचानक ही कैसे बदल गया ? सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि ‘‘ जो महिला पाकिस्तान के मुस्लिम परिवार में जन्मी, पली बड़ी, उम्र के 27 साल वहीं गुज़ारे और आज उसे ना इस्लाम का कलमा याद है और ना ही नमाज़ों की गिनती याद है’’। क्या यह बात किसी को हजम हो सकती है जबकि नमाज़ों की गिनती, कलमा तो आज के दौर में गैर मुस्लिमों तक को याद हो चुका है। यह कह रही है कि इसके परिवार की माली हालत खस्ता था। चार चार मोबाइल फोन होने के सवाल पर यह कहती है कि तीन मोबाइल बच्चों के हैं। इश्क बाज़ी करना और हर रोज़ नये आशिक पकड़ना इसका शौक है यानी सचिन नामक व्यक्ति पहला शिकार नहीं है इससे पहले भी शिकार बनने वालों में अभी तक 6 नाम सामने आ चुके हैं।

इसके पास फर्ज़ी आईडी, पांच पासपोर्ट हैं। चार मोबाईल फोन हैं। कई सिम कार्ड हैं। इसका एक भाई पाकिस्तानी आर्मी में है।

अब सवाल ये पैदा होते हैं कि ‘‘यह चारों बच्चों के साथ घर से भागी, तब इसके परिवार ने गुमशुदगी दर्ज कराई होगी। चार बच्चों के साथ किसी महिला के गायब होने पर किसी भी देश की पुलिस में हड़कम्प मचना लाज़मी है। पाकिस्तान पुलिस में भी उथल पुथल हुई होगी। उसके परिवार ने पुलिस और मीडिया को ये भी बताया होगा, कि महिला और बच्चों के पासपोर्ट (अगर होंगे तो) लेकर गई है। पासपोर्ट के साथ भागने की खबर पर पुलिस ने सभी एम्बेसियों से सम्पर्क किया होगा। शारजाह गई तो वीज़ा लिया होगा। एम्बेसी ने पुलिस को बता ही दिया होगा कि शारजाह गई है। ऐसी हालात में किसी भी देश की पुलिस तत्काल उस देश से सम्पर्क करती है, तो पाकिस्तान पुलिस ने भी शारजाह सरकार से सम्पर्क जरूर किया होगा। क्योंकि बात सिर्फ भगोड़ी महिला तक की नहीं चार बच्चों की है। शारजाह पहुंचने पर कस्टम टीम ने इसके सामान की तलाशी भी गई होगी, तब फर्ज़ी आईडी, पांच पासपार्ट, कई सिम कार्ड, देखकर शारजाह पुलिस कैसे अनदेखा कर सकती है। साथ ही ऐसा तो सग्भव ही नहीं कि शारजाह एअरपोर्ट पर एक हवाई जहाज़ से ऊतर कर नेपाल जाने वाले जहाज़ में सवार हो गई होगी,। ज़ाहिर है हफता दस दिन शारजाह में रही होगी।

इसपर सवाल यह भी शाहजाह सरकार ने उसे हिरासत में लेकर वापिस क्यों नहीं भेजा ? जबकि शारजाह और पाकिस्तान के सम्बन्ध भी काफी बेहतर हैं।

नेपाल से भी वीज़ा लिया होगा। नेपाल पैदल तो पहुंची नहीं, जहाज से गई होगी। क्या बिना वीज़ा ही नेपाल पहुंची ? नेपाल पहुंची तो नेपाल एअरपोर्ट पर उसके पास पांच पासपोर्ट, कई सारे सिम कार्ड, आदि देखकर नेपाल कस्टम और पुलिस उसे हिरासत में क्यों नहीं लिया गया ? नेपाल के रास्ते भारत में घुसी, कई महीने से नोयडा में रह रही है। यहां सबसे अहम पहलू यह है कि ‘‘इसके मामले भारत की खुफिया एजेंसियां का भनक कैसे नहीं लगी। महीनों बाद पुलिस ने उसका दरवाज़ा खटखटाया और दो दिन दावत खिलाकर बिदा कर दिया। वह खुद बता रही है कि जेल स्टाफ और पुलिस बहुत अच्छी है, बहुत ध्यान रखा उसका। अवैध तरीक़े से देश में घुसकर महीनों से रहने वाली घुसपैठिया को इतनी आसानी और जल्दी ज़मानत केसे मिली ? जककि उसके पास से फर्ज़ी आईडी, पांच पासपोर्ट, आधा दर्जन सिम कार्ड, चार मोबाइल के साथ और भी बहुत कुछ बरामद हुआ तो उसको दो दिन में ही ज़मानत कैसे दी गई ? उसकी ज़मानत लेने वालों से कड़ी पूछताछ क्यों नहीं की गई ? इसकी वकालत करने वकील भी खड़े हो गये जबकि बहुत से मामलों में पूरी बार कौंसिल को हाथ खड़े करते देखा गया है।’’

जबकि हज़ारों पाकिस्तानियों को सालों साल जेल में ही सड़ाने के साथ ही उनको बुरी तरह टाॅर्चर भी किया जाता है, ‘‘गौर तलब बात यह है कि आखिर इसपर इतनी महरबानी क्यों ?’’

यहां याद दिलाते चलें कि लगभग बीस साल पहले भारत सरकार ने उन दर्जनों पाकिस्तानी महिलाओं को देश से निकाला था, जो पिछले 25 - 30 साल से यहां शादियां करके सकुन से रह रही थीं उनके कई कई बच्चे थे, उन्हें उनके नन्हें नन्हें बच्चों को भी छोड़कर जाने पर मजबूर किया गया था। दूसरा तरफ 2004 -05 के दौरान लगभग 130 पाकिस्तानी घुसपैठिये गुजरात आए, उन्हें हिरासत में लेने निकाले जाने की बजाए आजतक सरकारी दामाद की तरह पाला जा रहा है, इन घुसपैठियों में पाकिस्तान सरकार का एक मंत्री भी था। ठीक वही मामला इस महिला के साथ भी किया जा रहा है। इसे भी सरकारी मेहमान बनाकर रखा जा रहा है। ताज़ा मामला ही देखें कि गुज़रे हफ्ते ही यूपी के बरेली के कस्बा आंवला के पेन्टर तौहीद की गेम ओर सोशल मीडिया के जरिये पाकिस्तानी युवक से दोस्ती हुई। ये लोग दोस्ती के नाते अकसर बातचीत कर लेते। मुस्लिम निगरानी सेल यानी सरकारी आईटी सेल को हज़म नहीं हुई जुलाई के शुरू में ही एनआईए ने ताहीद के घर छापा माराकर उसे हिरासत में लिया माबाईल जब्त किया तलाशी ली, बेंक अकाउन्ट खंगाले जाने लगे ओर आजतक यही सब चल रहा है। जबकि तथाकथित सचिन पिछले तीन साल से लगातार रोजाना कई कई बार घण्टों तक इस महिला से चिपका रहता था तब आईटी सेल को दिक्कत क्यों नहीं हुई ?

आप इस बात को सेव करके रख लीजिये कि अभी कुछ दिनों तक सीमा के नाम के मुजरे किये जाते रहेंगे। 2024 शुरू होते ही इस महिला का पर्दा फाश किया जायेगा। तरह तरह के आरोप लगाये जायेंगे फिर नफरत जिकादियों को काम पर लगाकर मुसलमान पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दू समाज को भड़काकर 2024 चुनाव पर हाथ साफ किया जायेगा।


Saturday, 1 July 2023

‘‘हमारी क़ौम तो मुर्दा है एक ज़माने से, जो मर चुका है वो दोबारा मर नहीं सकता।’’ - इमरान नियाज़ी

 


‘‘फ़ुज़ूल आप पे इल्ज़ामे क़त्ल है  साहिब, मरे हुवों को कोई क़त्ल कर नहीं सकता।’’

‘‘हमारी क़ौम तो मुर्दा है एक ज़माने से, जो मर चुका है वो दोबारा मर नहीं सकता।’’


आज से लगभग तीस साल पहले लखनऊ यूनीवर्सिटी के मुशायरे में मशहूर शायर ‘‘मन्ज़र भोपाली’’ के पढ़े हुए ये शेर आज सौ फीसदी नक्शा हैं आज के उन लोगों के हालत का जो खुद को मुसलमान कहते फिरते है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये हकीकत काफी लोगों को बुरी लगेगी, कुछेक दुश्मन बन जायेंगे, लेकिन वक्त और हालात का तक़ाज़ा है कि ‘‘मुरदा बन चुकी क़ौम को आइना दिखाया जाए। दरअसल सच्चाई ये है कि मेरी क़ौम भैंसा खाती है तो उसकी खोपड़ी भी भैंसे की ही हो चुकी हैं। और इसी भैंसा खोपड़ी ने पूरी क़ौम को मुरदार बना दिया है। साथ ही साथ दुनिया की दूसरी बड़ी क़ौम को हिजड़ा बनाने में मुल्लाओं ओर मियाओं का बहुत बड़ा हाथ है। इन मुल्लाओं ओर मियाओं ने क़ौम को शिया और सुन्नी में बांटा। फिर बरेलवी, सुन्नी ग्रुप को वहाबी, देवबन्दी, अहले हदीस नाम के टुकड़ों में बांटा। इतने से भी इनको सकून नहीं मिला तब इन्होंने सकलैनी, मदारी, चिश्ती, नियाज़ी वगैराह को अलग कर दिया। कुल मिलाकर अपनी दुकाने चलाने और मालामाल बने रहने के साथ ही साथ भरपूर दबदबा बनाने के लिए दुनिया की दूसरी बड़ी कौम के सैकड़ों टुकड़े कर दिये। मशहूर शायर हाशिम फिरोज़ाबादी ने सच ही कहा था, कि 

‘‘सैकड़ों खुदा हैं जिनके वो एक जगह खड़े हैं’’  

‘‘एक  खुदा  वाले  सारे  बिखरे  हुए  पड़े हैं’’ 

मुल्ला और मियां तो अपने ऐश के लिए क़ौम की बलि दे रहे हैं, इन मुल्लाओं और मियांओं ने क़ौम का इस हद तक ब्रेन वाॅश कर दिया है कि क़ौम अपना अच्छा बुरा खुद सोचने समझने की सलाहियत पूरी तरह खो चुकी है। 35 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाली कौम का ना तो अपना कोई खबरया चैनल है और ना ही मेन स्ट्रीम में कोई अखबार। और जो कुछ वीकली या पन्द्रह रोज़ा अखबार, पोर्टल वगैराह हैं तो उनमें 99 फीसदी तो दलाली करके कमाई में लगे हैं। इक्का दुक्का अखबार, पोर्टल हिम्मत करके क़ौम के मुद्दों को उठाते हैं तो क़ौम इनको सपोर्ट नहीं करती। कौम के व्यापारी, नेता, मुल्ला, मियां, विज्ञापन आरएसएस लाॅबी के अखबारों को देते हैं। मुस्लिम अखबारों को विज्ञापन नहीं देते, क्योंकि इन छोटे अखबारों में इनकी रंग बिरंगी फोटो नहीं छपती। जब जब मामला इस्लाम का होता है, तब ना कोई मुल्ला मुंह खोलने की जुर्रत करता है ना कोई मियां ही दम भरता है। हां अगर अपने खानदान या खुद की किसी कारगुज़ारी पर उंगली उठती है, तब ये लोग अपने गुर्गो को उंगली उठाने वाले के घरों पर हमले मारपीट तोड़फोड़ कराने में देर नहीं करते। हद तो ये है कि इनके अपने परिवार के खिलाफ मुंह खोलने वाले पर फौरन फतवे लगाकर उसके खिलाफ समाज को भड़काने में देरी नहीं की जाती लेकिन जिन मामलों में फतवे लगाना ज़रूरी होता हे वहां सांप सूंघा रहता है। हर रोज़ उर्स चादर जलसों मदरसों के नाम पर क़ौम के पैसे को हड़पना ही इनका पेशा है। कभी किसी मुल्ला या मियां ने कोशिश नहीं की कि कब्रों पर पचासों करोड़ कीमत के पत्थर लगाने से बेहतर है कि क़ौम के बच्चों के लिए अच्छे स्कूल कालेज खोलें कौम के बच्चों को आईएएस, आईपीएस, डाक्टर, इंजीनियर, वकील बनाने की कोशिश नहीं की। क्योंकि स्कूल कालेज जहालत को मिटा देंगे और जहालत खत्म होगी तो मियांओं मुल्लाओं के परिवारों को मस्ती, ऐशों आराम करने के लिए मिलने वाले माल में रूकावट आ जायेगी।

अब सवाल ये पैदा होता है कि मुल्ला या मियां तो अपनी दुकाने चलाने ओर क़ौम के माल पर ऐश करने के लिए सब करते हैं लेकिन इतनी बड़ी कौम जहालत की दलदल से क्यों बाहर नहीं आना चाहती। मान लिया कि बीस साल पहले तक पढ़ाई लिखाई कम थी इसलिए किसी की समझमें में इनकी करतूतें नहीं आती थीं, लेकिन अब तो पढ़े लिखे तबक़े की बड़ी तादाद बनकर खड़ी हो चुकी है, फिर भी क़ौम अपने हालात को बदलना नहीं चाहती। काफ़ी तादाद में लोग पढ़ लिखकर डाक्टर, इंजीनियर, वकील बन गये, लेकिन इनसे क़ौम को कोई फ़ायदा पहुंचने की बजाए ये सिर्फ और सिर्फ अपने भले में लगे हैं, ये लोग अपनी दुकानों के नाम मज़हबी रखकर क़ौम को ही नोचने में लगे दिखते हैं। इनका मक़सद सिर्फ माल कमाना ही होता है। जबकि दूसरी तरफ़ नज़र डालिये, खुले आम धर्मवाद फैलाते मिलते हैं, चाहे वे डाक्टर हों या वकील, जमकर धर्मवाद फैला रहे हैं। लेकिन हमारे वाले खुद कुछ करने की जगह उलटे दूसरों के हौसले भी कुचलने में लग जाते हैं। डाक्टर, इंजीनियर को छोड़िये, कम से कम वकील तो होते ही हैं कानून के जानकार, कभी किसी मामले में क़ौम के लिए नहीं खड़े होते। देश में एक दो बड़े मामले ऐसे भी हुए जिनमें मुस्लिम समझे जाने वाले वकीलों ने आरएसएस के वकीलों का साथ दिया, खुलेआम बेइंसाफी का नंगा नाच देखा, इनकी जुर्रत नहीं हुई कि इंसाफ कीे लिए कानूनी लड़ाई लड़ें। यही हालात मुस्लिम नाम वाले डाक्टरों के भी है। डा0 कफील पर हुए जुल्म के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के नाम पर मुस्लिम नामों वाले डाक्टरों को सांप सूंघ गया, लेकिन आरएसएस की मेडीकल ब्रांच यानी आईएमए के हर तमाशे में ये आगे आगे कूदते दिखते हैं। चलिये ये बात तो थी पढ़े लिखे तबक़े की बुज़दिली और फ़र्ज़ी मुसलमानियत। अब बात करते हैं, उन लोगों की जो बड़ी ही शान से पत्रकार बनकर घूमते हैं। ये फौज तो क़ौम के सिर पर सिर्फ एक बोझ के सिवा कुछ नहीं। केवल उगाही तक ही है इनकी पत्रकारिता। सबसे बड़ी बात तो यह हे कि मुस्लिम नामों वाले स्वंयभू पत्रकारों की ये फौज भी मीडिया के चोले में छिपे दलालों और पालतुओं की ही राह पर चलती दिखती है। इनकी भी बड़ी मजबूरी है, मजबूरी ये है कि बेचारे आठवीं के बाद कभी स्कूल गये नहीं, लिख पढ़ नहीं सकते, तो हालात की जानकारी नहीं रख सकते। अफग़ानिस्तान लुटा मुसलमान मस्त रहा, गुजरात में मुसलमानों पर आतंक बरपाया गया मुसलमान अपनी मस्ती में मस्त रहा, कश्मीर, सीरिया, इराक, फिलिस्तीन में लगातार क़ौम को मिटाने की कोशिशें की जा रही हैं, मुसलमान को उर्स, चादर, जलसो,ं मज़ारों से फुर्सत नहीं। इतना ही नहीं बल्कि इस्लाम को मिटाने और मुस्लिम औरतों को इस्लामी कायदे क़ानून के खिलाफ़ खड़ा करने की साजिश के तहत कुछ पालतू चैनलों पर इस तरह के सीरियल दिन भर दिखाये जा रहे हैं। किसी मुसलमान ने ना विरोघ किया और ना ही अपने घरों में इन आतंकी चैनलों के चलाने पर रोक लगाई। हद तो ये है कि सीएए मामले में रिलायंस/जियों की मालिक नीता अम्बानी ने खुलकर ज़हरीली उल्टियां की, करोड़ों की तादाद में जियो सिम चलाने वाली जाहिल क़ौम में सिर्फ चार पांच ने ही जियो का बहिष्कार किया बाकी करोड़ों ज्यों के त्यों मस्त हैं। ‘‘आजतक, जी न्यूज़, एबीपी जैसे नफरती चैनलों में सैकड़ो की तादाद में मुस्लिम ग़ुलाम हैं किसी ने अपने ज़मीर को नहीं जगाया। ‘‘ज़ी’’ का इंटरटेंमेंन्ट चैनल मुस्लिम औरतों में इस्लाम के खिलाफ खुलकर ज़हर भर रहा है किसी को हरारत नहीं आई। अब अगर बात करें जन्नत के ठेकेदारों की तो ये फिल्म अदाकारों, नेकर पहनकर मज़दूरी करने वाले ग़रीबों पर, इनके परिवारों की किसी हरकत के खिलाफ़ मुंह खोलने वालों के खिलाफ़ फतवे लगाने में देरी नहीं करते लेकिन अपने खून से बन्दे मातरम लिखने, आसिफ़ा ओर बिलकीस के गुनाहगारों, नबी के खताकारों के मुस्लिम नाम वाले मददगारों के खिलाफ़ फतवे देने की हिम्मत नहीं है।

खुद अपनी बुज़दिली, जहालत, मुफत खोरी की वजह से क़ौम के गिरते हुए हालात का इलज़ाम आरएसएस/बीजेपी समेत दूसरे दुश्मनों पर थोपे जाते हैं। जब तुम खुद ही मुर्दा बन चुके हो तो अपने कुचले जाने का इलज़ाम किसी पर मत थोपो।

Thursday, 8 June 2023

पत्रकार कहलाने या पत्रकार बनकर फिरने और पत्रकार होने में ज़मीन आसमान का फ़र्क होता है - इमरान नियाज़ी





पत्रकार शब्द का अर्थ क्या है ? पत्रकारिता क्या होती है ? किसी पत्रकार कहा या माना जाता है ? क्या कैमरे या माईक आईडी लेकर घूमने वाला हर शख्स पत्रकार होता है ? ऐसे ही कई बड़े सवाल हैं जिनका जवाब शायद कुकुरमुतों की तरह गली गली दिखने वाले मोबाईल मेडेड स्वंयभू पत्रकारों ने सुने तक नहीं होंगे। आईये सबसे पहले बात करते हैं कैमरे और माइक लेकर खबरें कवर करने वालों की। क्या ये पत्रकार हैं ? जी नहीं, ये पत्रकार नहीं बल्कि रिपोर्टर या संवाददाता होते हैं। संवाददाता और पत्रकार में बहुत बड़ा फर्क होता है। आईये एक पत्रकार से आपको मिलवाते हैं। 1973-74 के दौरान उ0प्र0 के मुज़फ्फ़रनगर में ‘‘भ्रष्ट लोगों की दुनिया’’ नाम से एक साप्ताहिक पत्र प्रकाशित होता था। इसके प्रकाशक ओर सम्पादक थे ‘‘राजपाल सिंह राणा’’, सिर्फ दो पेज का यह अखबार भ्रष्टाचारियों के लिए ही नहीं बल्कि सूबाई और केन्द्र सरकार के सिरों पर मण्डराता एक खतरा था। आदरणीय ‘‘राणा’’ जी मेरे पिता जी के परम मित्र थे। 6 फिट से ज्यादा लम्बी और सुडौल कठकाटी वाले इस शख्स का ऐसा मान सम्मान था कि किसी सांसद मंत्री का नहीं था। राणा जी जिस सरकारी आफिस में क़दम रखते तो उस आफिस में सन्नाटा छा जाता था। क्योंकि वे असल, निष्पक्ष, और ईमानदार पत्रकार थे। हम यह नहीं कह रहे कि आज निष्पक्ष या ईमानदार पत्रकार नहीं हैं। हैं, लेकिन पूरे देश में 10-15 ही होंगे। बाकी तो मेन स्ट्रीम से मोबाइल मेडेड तक पालतू और दलालों की भीड़ ही रह गई है। आज वे पत्रकार बने फिरते मिल रहे हैं जिन्होंने ज़्यादा से ज़्यादा आठवीं या दसवीं तक ही स्कुल देखे, उसके बाद कुछ काम धंधे में लगने की कोशिश की। लेकिन आज के पढ़े लिखे दौर में आठवीं दसवीं तक पढ़ा वह व्यक्ति जिसे हिन्दी तक सही से लिखना या बोलना नहीं आती वह डिजिटल दौर में कुछ कर नही सके, तो सबसे आसान और सस्ते में शुरू हो जाने वाली मीडिया की लाईन पकड़कर घर चलाने में लग जाते हैं। और बड़ी ही दबंगई के साथ खुद को पत्रकार कहने लगते हैं। ऐसा भी नहीं कि ऐसे सब ही महामुनि अपने ही बल पर कूदते हों, बल्कि इनमें बड़ी तादाद पाक्षिक, साप्ताहिक समाचार पत्र चलाने वालों की भी ह,ै जिनके लिए अखबार सिर्फ़ कमाई का ज़रिया भर है, इनके अलावा कुछेक ने दस पन्द्रह हज़ार रूपये खर्च करके वेबसाईटें बनवाकर कमाई शुरू करदी है, और कहलाने लगे ‘‘सम्पादक जी’’, 15 सौ से चार हज़ार रूपये के दामों पर बेचने लगे परिचय पत्र (प्रेस कार्ड)। दरअसल एण्ड्रायड फोन के अविष्कारक ने शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ‘‘वह जो स्मार्ट मोबाइल लोगों को आपस में जुड़े रहने के लिए बना रहा है, वो पत्रकार बनाने की मशीन है। इसी मशीन का कमाल यह हुआ कि जो काम लोग 10-15 साल में पूरी तरह नहीं सीख सके वह काम यह मशीन सिर्फ कुछ ही मिनटों में कर देगी, यानी हम जैसे बेवकूफ लोग 25-30 साल में भी पूरी तरह से पत्रकार नहीं बन सके, और मोबाइल ने चन्द दिनों में ही पत्रकारों की बाढ़ लाकर रख दी। इस बाढ़ ने पत्रकारिता के नाम को ही कलंकित कर दिया। मेन स्ट्रीम का तो पहले ही दलाली करण हो चुका है। पूरी की पूरी फौज आज पालतू बन चुकी है, इसलिए इस पालतू फौज से सच्ची पत्रकारिता की उम्मीद करना ही बेकार है, ये पालतू फौज सिर्फ सरकार की दलाली और इस्लाम, मुसलमान, मस्जिद, मदरसों के खिलाफ़ नफरती माहौल तैयार करने के काम पर लगी है। कम से कम यह तो सकून है कि पालतू मीडिया के गुर्गे हर वक्त गली गली नहीं फिरते मिलते और ना ही सौ सौ रूपये की उगाहियां करते दिखते। 

फिलहाल हम बात करते हैं मोबाइल मेडेड स्वंयभू महामुनियों की। जिनका पूरा मीडिया हाऊस उनकी जेब में रहता है और पूरी टीम खुद उनमें ही निहित है। ना किसी घटना स्थल पर जाने की आवश्यक्ता ना खबरें कवर करने की भागम भाग। आराम से घर में लेट, बैठकर ‘‘सबसे पहले, सटीक और सच्ची खबर’’ पेलते रहते हैं। बैठे यूपी के किसी गांव में होते हैं, और सटीक व सच्ची खबर बताते हैं कश्मीर, पंजाब, बंगलादेश, पाकिस्तान की। यहां यह बतादें कि ये वरिष्ठ, योग्य, अनुभवी और सच्चे स्वंयभू पत्रकार देसी या विदेशी किसी भी न्यूज़ एजेंसी के सदस्य भी नहीं होते, फिर भी देश विदेश की सटीक सच्ची खबरें सबसे पहले इनके पास आती है। जी हां, हम उन्हीं की बात कर रहे हैं जिन्हें  हिन्दी भी सही से लिखना या बोलना नहीं आती। बात करते हैं तो ऐसा लगता है इन्टर नेशनल पत्रकार है। 

खैर, हम कहना यह चाहते हैं कि पत्रकारिता के पेशे पूरी तरह लज्जित और कलंकित किया जा चुका है। आज समाज में पत्रकार की कोई वैल्यू नहीं रह गई आप चाहे कितने ही काबिल अनुभवी या निष्पक्ष पत्रकारिता क्यों ना करते हों। लोग आपको देखते सौ दो सौ रूपये उगाही करने वालों की ही गिनती में।

वैसे तो मोदी सरकार ने सवाल पूछने वाले अखबारों को बन्द करके अपनी जान बचाई लेकिन इन मोबाइल मेडेड को अभयदान इसलिए दिया क्योंकि सरकार जानती है कि इनमें ना सवाल करने की हिम्मत है और ना ही योग्यता। बल्कि मोबाइल मेडेड स्वंयभू पत्रकारों की ये फौज सरकार की ही मक्खन मालिश में लगी है।

इन्हीं महामुनियों की हरकतों के चलते हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी सख्त रूख दिखाते हुए गम्भीर टिप्पणी की है।


Tuesday, 30 May 2023

कुकुरमुतो की तरह फैले मोबाइल मेडेड स्वंयभू पत्रकारों का सच

 

आपको याद होगा कि लगभग दस साल पहले घुमन्तु भिकारियों की टोलियां बाज़ारों में दुकानों पर मांगती थी। जब दुकानदार "चवन्नी" (25 पैसे का सिक्का) देता तब टोली का मुखिया कहता कि  "4 लोग है" - "5 लोग हैं"  मतलब टोली के  "बन्दों की गिनती बताता"  तब दुकानदार 25 पैसे प्रति बन्दे के हिसाब से दे देते।

दिन ग़ुज़रते गये। इण्डिया डिजीटल होने लगा। मज़दूरों की जगह मशीनों ने लेली। कार्बन और टाईप राईटर की जगह कम्पूटर ने लेली। जब सब का डिजीटली करण हुआ तब उन घुमन्तू भिकारियों का भी डिजीटली करण हुआ।  "मेरा भारत बदल रहा है"  की चपेट में घुमन्तुओं की टोली भी आ गई।
घुमन्तुओं की टोलियों का आधूनिकी करण होकर नाम हो गया  "पत्रकार",  जी हां पत्रकार। हम बात कर रहे हैं उन घुमन्तुओं की जो  "पत्रकार बनाने वाली मशीन"  यानी  "एण्ड्रायड फोन"  से पत्रकार बन गये हैं।
दूसरी तरफ़ घुमन्तुओं की झोली और कटोरे का आधूनिकी करण होकर "पिट्ठू बैग और माईक आई डी"  का रुप ले लिया। ये सारे महाज्ञानी वैल एजूकेटेड स्वंभू पत्रकार वे हैं जिन्हें "पत्रकार" शब्द की ना परिभाषा ही मालूम है ना ही पत्रकार शब्द का अर्थ ही पता है। योग्यता का स्तर यह है कि किसी भी घटना को  "खबरिया भाषा"  में लिख नहीं सकते। खैर - परिभाषा या अर्थ पता होना इनके लिए ज़रुरी भी नहीं है क्योंकि इन्हें घटनाओं या हालात से कोई सरोकार भी नहीं होता। इनको तो सुबह से शाम तक किसी भी तरह 500 - 1000/ रुपये कमाने होते है। 
घुमन्तू बाज़ारों में दुकानदारों से अपनी टोली की गिनती के हिसाब से मांगते थे आधुनिकिकरण होने पर ये दुकानदारों की जगह चुनावी उम्मीदवारों के दरवाज़ों पर पहुंचने लगे। घुमन्तुओं की तरह  "टोली के सदस्यों की तादाद" की जगह "आईडी की तादाद" बताई जाने लगी यानी  "सर 4 आईडी हैं - 6 आईडी हैं"। इनकी अभूतपूर्व पत्रकारिता की योग्यता को बताता है इनकी लेखनी जैसे :- ख़बर में खद्दरधारियों/अफ़सरान यहां तक कि प्रधान व सभासद प्रत्याशियों के लिए "माननीय / महोदय / जी / श्रीमान" जैसे शब्दों का प्रयोग साथ ही किसी अफ़सर या पुलिस की तैयार की हुई स्क्रिप्ट को ही सम्पूर्ण मानकर फेसबुक / WhatsApp पर दौड़ाने लगना। इन महामुनियों ने तो Twitter जैसे प्लेटफार्म को भी चैनल या अख़बार समझ लिया है।
हमारी बात लगभग सभी को बुरी लगी है लेकिन सच तो सच है।


Sunday, 28 May 2023

राजतन्त्र और सामन्तवाद की तरफ घसीटा जा रहा है देश - इमरान नियाज़ी

‘‘सुप्रीम कोर्ट के आर्डर को पलटना एक करारा तमाचा है उन जजों के मुंह पर जिन्होंने महाराज अधिराज को खुश करके न्याय शब्द का मुंह काला करते हुए मनमानी थोपी और बेकसूरों को मौत के घाट उतरवा दिया’’

दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के नाम से जाना जाने वाला भारत 2014 से लगातार राजतन्त्र की तरफ घसीटा जा रहा है। हमने 2016 में ही कहा था कि भारत से लोकतन्त्र को खत्म करके सामन्तवाद में दाखिल किये जाने की कोशिशें की जा रही हैं। उस वक्त किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया। लेकिन तिगड़ी अपनी कोशिशों में लगी रही और लगभग 50 फीसदी कामयाब भी हो गई। मकसद में कामयाबी के लिए तिगड़ी ने किराये के भांडों को परमानेन्टली खरीदकर वीरगाथा शुरू कराई साथ ही विदेशी मालिकों की नीति पर चलकर ‘‘फूट डालो राज करो’’ का फार्मूला अपनाया, देश को बांट दिया जिससे बगावत के हालात ही ना पैदा हो सकें। फिर नोटबन्दी, लाॅकडाऊन, खेती बिल, देश की धरोहरों का बेचा जाना, दान में मिली आक्सीजन पर अपना नाम चिपकाकर बेचा जाना, गांव से गांव को मिलाने वाले लिंक रास्तों तक पर गुलामी टैक्स वसूला जाना, विरोधियों को सरकारी शूटरों के हाथों मौत के घाट उतरवाना, संविधान को खत्म किया जाना,  अदालतों को गुलाम बनाकर रखना, वगैरा ये सब राजतन्त्र और सामन्तवाद की सीढ़ियां है जो तिगड़ी आसानी से चढ़ती चली गई।

खेती बिल को छोड़कर बाकी सभी सीढ़ियां बिना ही किसी विरोध के आसानी से इतनी सीढ़ियां चढ़ लेने से तिगड़ी के होसले बुलन्द हुए। अगर बात करें अदालत नाम के उन कमरों की जिसकी कुर्सी को भगवान की कुर्सी माना जाता है तो तिगड़ी और उसके कारिन्दों ने उन भगवानों को ही खरीदकर और डराकर जेब में डाल लिया, जिनपर लोग अटूट भरोसा करके उन्हें निष्पक्ष मानते थे। वे छोटे से बड़े भगवान तक बिककर या डरकर तिगड़ी की मंशा के मुताबिक न्याय का मुंह काला करने लगे। ‘‘जिस देश में निचली अदालतें कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को ठुकराकर मालिकों के इशारे पर किसी धर्म स्थल की खुदाई कराये, या उसको छीनकर एक पक्ष को देने के काम करती हो’’,

जिस देश की सुप्रीम कोर्ट ये कहते हुए किसी को मौत दे कि ‘‘आरोपी के आतंक होने या किसी आतंकी संगठन से जुड़े होने का कोई सबूत नहीं पाया गया’’, ‘‘जिस देश की सुप्रीम कोर्ट देश के सबसे बड़े कत्लेआम से जुड़े सभी मामलों को बन्द करा दे’’, ‘‘जिस देश की सबसे बड़ी अदालत 5 सौ साल के इतिहास को ही किनारे करके मनमानी थोपती हो।’’ ‘‘जिस देश में किसी गैंगस्टर के सत्तारूढ़ दल का नेता बनने उसपर चल रहे तमाम केसों को बन्द कर देती हों।’’ ‘‘जिस देश की अदालतें देश में बम धमाके करने वालों को देश की सबसे बड़ी विधायिका में बैठाने की इजाज़त देती हों।’’ उस देश में लोकतन्त्र की मोजूदगी मान लेना खुली आंखों से देखा जाने वाला सपना ही है। भारत में लोकतन्त्र से निकालकर राजतन्त्र या सामन्तवाद में दाखिल करने की कोशिशें गुज़रे नो साल से चल ही रही हैं। इसका सबसे बड़ा सबूत हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना है। यानी अगर देश की सबसे बड़ी अदालत लोकतन्त्र के संविधान के मुताबिक सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ़ फैसला देगी तो उसको सरकार नहीं मानेगी। मतलब साफ है कि सरकार खुद को सर्वोपरि मानती है और सुपर पावर बनाये रखना चाहती है। ऐसा लगने लगा है कि सुप्रीम कोर्ट ना होकर कोई छोटा अफसर है जिसे सिर्फ सरकार की ही तरफ दारी करनी है चाहे वो संविधान की भावना और प्रावधानों के खिलाफ़ ही क्यों ना हो। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बैंच के फैसले को पलटकर सरकार ने उन जजों के मुंहों पर ज़ोर दार तमाचा जड़ा है, जो सरकार को खुश रखने के लिए बेकसूरों को मौत देने, इतिहास को मिटाने, और हज़ारों पीड़ितों को न्याय की जगह ठेंगा दिखाते रहे। हम ये बिल्कुल भी नहीं कह रहे कि सभी जजों ने किसी फायदे के लिए इंसाफ का मुंह काला किया, हो सकता है कि कुछ ने लालच में किये, तो कुछ ने खौफ़ से किये। आज उन्हीं तमाम कारगुज़ारियों का अन्जाम सबके सामने हैं। दरअसल तिगड़ी शुरू से ही देश में राजतन्त्र और सामन्तवाद लाने की कोशिशों में लगी है। इसके लिए तिगड़ी ने सबसे पहले चुनाव आयोग को जेब में डाला, फिर मेन स्ट्रीम की मीडिया को पालतू बनाया, इसके बाद जांच एजेंसियों का विलय कराया, धर्मवाद के हथियार से एक बड़ी तादाद में आम जन मानस का ब्रेनवाॅश करके उनके दिमाग़ों में भरा कि ‘‘धर्म की रक्षा इन्हीं के हाथों में है।’’ फिर धीरे धीरे अपने मिशन की तरफ बढ़ने लगी तिगड़ी। देश की धरोहरें बेची, कोई विरोध नहीं हुआ, चुपके चुपके मनमाने बिल पास किये कोई विरोध नहीं, चीन को देश में कब्ज़े कराये गये देश सोता रहा, कश्मीर हिमांचल में सेब सन्तरे आदि की खेती पर मुंह चढ़ों को कब्ज़े कराये गये इसपर भी सन्नाटा रहा, अगर बदकिस्मती से देश की खेती का 90 फीसद किसान सिख और जाट ना होते तो देश के अन्नदाताओं को भी लाला का गुलाम बना दिया गया होता। सलाम है सिखों की हिम्मत और देश प्रेम को जिन्होंने दुम सीधी करके ही मैदान छोड़ा। निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक को इशारों पर नचा लेने से गदगद होकर तिगड़ी ने सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक लोकतान्त्रिक संस्था को भी खत्म करने का क़दम उठा दिया, अगर मान भी लिया जाये कि राजतन्त्र और सामन्तवाद लागू करने में अभी कुछेक साल का वक़्त लग सकता है तब भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ क़दम उठाकर तिगड़ी ने आने वाले उन जजों की हिम्मतों और ईमानदारियों को पहले ही कुचलने की कोशिश की जो कभी सीजेआई चन्द्रचूड़ के नक्शे कदम पर चलने की कोशिश कर सकते थे। अगर तिगड़ी ने राज्यसभा के पटल से अपनी मंशा के अनुरूप पास कराकर सीधे राजतन्त्र और सामन्तवाद लागू कर दिया जायेगा।

अब सवाल ये पैदा होता है कि अगर तिगड़ी अपने मकसद में कामयाब हो जाती है तो उनका क्या होगा जो इस वक्त तिगड़ी को ही धर्म और भगवान मानकर पूजने में लगे हैं ? या उन वैल एजूकेटेड लोगों यानी आईएएस, आईपीएस और कानून के अच्छे जानकार यानी जजों का क्या होगा जो आज तिगड़ी को खुश करने के लिए संविधान, इंसाफ और देश को रौंदते दिख रहे हैं ? उन खद्दरधारियों का क्या हाल होगा जो आज तिगड़ी की हर तरह से मदद में मस्त हैं ? यहां तककि राष्ट्रपति जैसी संवैधानिक कुर्सी पर आसीन होकर भी तिगड़ी की जी हजूरी में बिना सोचे समझे दस्तखत करते रहे ? इस सवाल के जवाब में हम दावे के साथ कह सकते हैं, कि सबसे ज्यादा बुरे दिन इन्हीं लोगों पर आयेंगे, बाकी आम जनता तो 1947 से पहले भी गुलाम थी, 1947 के बाद आज तक गुलाम ही है तो भविष्य में भी रह लेगी, देश का आम आदमी तो पहले से ही मानसिक गुलाम है इसलिए उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला।


Thursday, 23 February 2023

विस में पालतू मीडियाई रोबोटों की कुटाई पर छुटभैयों में मातम

विधान सभा में सरकारी प्रवक्ताओं दलालों की कुटाई पर मातम - इमरान नियाज़ी

अपनी बात कहने से पहले कहना यह है कि इसको पढ़कर ना तिल्मिलाईये ना कूदिये बल्कि शान्त दिमाग़ से समझिये।
दुनिया के इतिहास में पहली बार गुज़रे दिनों उ0प्र0 विधान सभा में कुछ मीडियाई दलालों की कुटाई हुई। इस कुटाई से मीडिया के उस तबक़े में सबसे ज़्यादा मातम बर्पा है जिसको विधान सभा में घुसने तो क्या विधान सभा गेट पर भी जाने नहीं दिया जाता। मातम करने वाले तबके को कुटने वाला तबका कभी पत्रकार या मीडिया कर्मी तक नहीं माना जाता। यानी पाक्षिक/साप्ताहिक अखबार न्यूज़ पोर्टल आदि से जुड़े मीडिया कर्मी। कूटा गया वर्ग खुद को बड़ा पत्रकार समझने की बीमारी से पीड़ित है। दूसरा बड़ा पहलू यह है कि विधान सभी में केवल पालतू और चाटू मीडिया को इन्ट्री देने का प्रावधान है। अब कुछ महा ज्ञानी कहेंगे कि विधानसभा या संसद में केवल मान्यता प्राप्त को ही इन्ट्री होती है। इसके जवाब में यह जानना ज़रूरी है कि मान्यता मिलती किसको है ? जी हां हमारे देश की यह विडम्बना रही है कि मीडिया जगत में सरकार सिर्फ उन्हीं को देती है जो सरकार के पालतू बनकर चम्चा गीरी करते हैं, जो कभी सरकार से सवाल पूछने की गलती नहीं करते, जिन्हें देश की जनता की समस्यायें नहीं दिखती,  जिन्हें कभी स्थानीय मुद्दे नहीं दिखते, जो खद्दर धारियों और अफ़सरों के गुणगान करने वाले सरकारी भोपू बनकर रहते हैं। बाक़ी जो सरकार से सवाल पूछे, जो जनता की समस्याओं को उठाये, जो खद्दरधारियों और अफ़सरान को सलाम ना ठोकते हों, जो दलाली ना करते हों, उन्हें कभी मान्यता नहीं दी जाती। हम यह बात सिर्फ़ हवा में नहीं कह रहे बल्कि सैकड़ों सबूत मौजूद हैं। दूसरा पहलू यह कि ये वही पालतू हैं जो उनको फ़र्ज़ी बताते फिरते हैं जो आज ज़ोर शोर से कुटाई का मातम करते दिख रहे हैं। साथ ही जब जब पाक्षिक/साप्ताहिक अखबार या पोर्टल वालों पर सरकारी आतंक होता है तब ये पालतू जमकर मुजरे करते दिखते हैं। लेकिन आज जब पालतुओं पर दाब पड़ी तब वे ही सब मातम करते दिख रहे हैं जिन्हें ना तो सरकार ही सम्मान देती है और ना ही खुद को बड़ा ओर असली समझने वाले पालतू। यहां एक बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जिनको वैल्यू नहीं दी जाती वे आज मामत क्यों कर रहे हैं। इसकी सच्चाई इकलौती और बेहद कड़वी है। दरअसल गुज़रे दस एक दशक के दौरान पत्रकारों की बाढ़ आई हुई है। इनमें 99 फ़ीसदी वे महामुनि शामिल हैं जोकि एण्ड्राइड फोन से पत्रकार बनते हैं। लगभग 80 फ़ीसद ने डिग्री कालेज तो बड़ी बात है कभी इन्टर कालेज के अन्दर जाकर नहीं देखा। लेकिन बन गये बड़े ही काबिल और वरिष्ठ पत्रकार। पांच से दस हज़ार रूपये का एक मोबाइल खरीदा और बन गये बड़े पत्रकार और करने लगे दलाली। जिन्हें पत्रकार शब्द का सहीं अर्थ नहीं मालूम होता है लेकिन दिन भर कापी पेस्ट करके तोप चलाते फिरते हैं। अब दूसरा बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि आखिर ये मोबाइल मेडेड स्वंयभू पत्रकार मातम कर क्यों रहे हैं। इसका सीधा और इकलौता जवाब है कि इन बेचारों को मालूम ही नहीं है कि पत्रकार बनकर फिरने और पत्रकार होने में कितना अन्तर है।

Sunday, 18 November 2018

मुस्लिम वोट की सेल - इमरान नियाज़ी


गुज़री 5 और 6 नवम्बर को दो ऐसी शख्सियतों के उर्स थे जिन्होने अपनी इस्लाम परस्ती तक्वे परहेज़गारी के बल पर दुनिया भर मे अपने नाम का सिक्का कायम कर दिया। यानी आला हज़रत और मुफ्ती आज़म हिन्द का, जहां तक मेरी जानकारी मे है तो हमने सुना है यह दोनो ही सियासत से बहुत दूर रहते थे हद तो यह थी कि खुद मुफ्ती आज़म ने अपने सगे दामाद एमएलसी रेहान रज़ा खां से बात करना तक बंद कर दिया था। ऐसे बुजु़र्गों के मंच से मुस्लिम वोटों की बिकं्री किया जाना वो भी खुद उन बुज़ुर्गों के अपनो के हाथों ही, यह एक चौकाने वाली बात है। उर्स के दौरान बरेलवी उलमाओं ने सीधे सीधे मुस्लिम वोट बेचे, उर्स के दौरान आल इण्डिया तन्जीमे उल्लेमाए इस्लाम ने बड़ा ही शर्मनाक एलान करते हुए कहा कि मुसलमान भाजपा और मोदी की मुखालफत बिल्कुल भी ना करे, मौलबियों ने यह एलान सिर्फ और सिर्फ इसलिये किया क्योंकि चन्द दिन पहले ही नशीली गोलियों के साथ दुबई मे अरेस्ट कर लिये गये तौसीफ रज़ा खां को रिहा कराने मे केन्द्रीय मंत्री और बरेली से बीजेपी सांसद संतोष गंगवार ने कुछ मदद करदी थी सांसद संतोष गंगवार के इस अहसान के बदले में मुसलमान को बीजेपी की मुखालफत ना करने का मशविरा दे दिया गया। क्यों जी क्यों ना करें मुसलमान बीजेपी का विरोध? हां अगर यह कहा जाता कि संतोष गगंवार का विरोध ना करें, तो बात किसी हद तक समझा में आ सकती थी, क्योंकि संतोष गंगावार ने भाजपाई होते हुए भी मदद की। यहां एक बात साफ करना ज़रूरी है कि संतोष गंगवार के पास आज तक जो भी मदद मांगने गया संतोष गंगवार ने बिना भेदभाव किये मदद करी। मैं बीजेपी का विरोधी होते हुऐ भी संतोष गंगवार का विरोध नही करता क्योंकि संतोष गंगवार व्यक्तिगत रूप से बेहतर इंसान है भाजपाई होते हुऐ भी संतोष गंगवार ने व्यक्तिगत रूप से कभी मुसलमानों के खिलाफ कुछ नही किया इसलिये संतोष गंगवार का विरोध ना करने की सलाह दिया जाना तो समझ मे आता है लेकिन बीजेपी का विरोध ना करने की सलाह देना वह भी सिर्फ इसलिये की भाजपाई नेता ने तौसीफ रजा़ को छुड़ाने मे मदद की, यह शर्मनाक बात है कि सिर्फ एक तौसीफ रज़ा खां की रिहाई के बदले मुसलमान गुजरात के साढ़े तीन हज़ार से ज़्यादा बेगुनाह मुसलमानों के कत्लेआम को कैसे भुल सकता है ? सैकड़ों मुस्लिम मासूम बच्चियों की आबरू जनी को कोई भी सच्चा मुसलमान कैसे भूल सकता है ? दर्जनों हामला ओरतों के पेट चाक करके बच्चे निकालकर आग में फेंके जाने के मंजर को किस दिल से अनदेखा किया जा सकता है? असम में आतंकियों के हाथों सैकड़ों मुसलमानों के कत्लेआम किये जाने के वाक्ये को कहां मिटाया जाये, क्या तोसीफ रजा की अहमियत हजारों बेकसूर मुसलमानों की जिन्दगियों, मासूमों की जिन्दगियों मुस्लिम बच्चियों की आबरूओं से ज्यादा हो गई जो गुजरात और असम मे आंतकियों ने तार तार की थी। क्या तौसीफ रज़ा वैल्यु उमर खां, पहलु खान, अखलाक ज़ाहिद अहमद,मज़लुम अंसारी, इम्तियाज़ खां, मुस्लैन अब्बास नजीब, ज़हीर हुसैन वगैरह की जानो से ज्यादा है। जिनकी जाने बीजेपी पोषित आंतक ने खत्म की। सिर्फ तौसीफ रजा की रिहाई के बदले बकसूर  इशरत जहां के खून के कत्ल को मिटाया जा सकता है। क्या सौहराबुद्दीन और सोहराबुददीन कत्ल के चश्मदीद बेगुनाह तुलसीराम प्रजापति के कत्ल को किस दिल से भुला दिया जायें। बीजेपी का विरोध ना करने की सलाह देने वाले बतायें कि दादरी में गौआतंक ने मो0 अखलाख को बेरहमी से कत्ल कर दिया और उनके घर में रखे बकरे के गोश्त को गाय का गोश्त बताकर आतंक बर्पाया गया, क्योंकि गोश्त बकरे का था इसलिए कानून ने अपना काम किया लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश में भी कानून बीजेपी का गुलाम बना वैसे ही उसी मटन को बीफ बना दिया गया और आतंक बरपाने वालों को छोड़ दिया गया, जाहिर है कि यह भी बीजेपी की करतूत थी इसे कैसे भूला जा सकता है। शर्म आनी चाहिये थी इस तरह का मशविरा देने वालों को, क्योंकि मासूम आसिफ के गुनाहगार भी भाजपाई है, शहीद हेमन्त करकरे की कुर्बानी पर कालिख पोतकर अजमेर दरगाह, मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस धमाके करने वाले आतंकियों को क्लीनचिट देकर कानून से आज़ाद करने वाली मोदी सरकार भी भाजपाई है, क्या तोसीफ रजा खां की अहमियत मासूम आसिफा की आबरू और जान से ज्यादा है, हां अगर यही मशविरा संतोष गगंवार तक ही सीमित होता तब शायद आसानी से समझमें आ जाता और जिन्दा जमीर बाशऊर इंसान को इसपर एतराज भी ना होता लेकिन यहां तो पूरी बीजेपी और मोदी की मुखालफत ने करने की सलाह देने वालो के परिवारों मे से किसी के साथ ऐसा ही कोई काण्ड हुआ होता तो क्या वह इसी तरह से शर्मनाक मशिवरा मुसलमानों को देते? समझना मुश्किल हो चुका है कि आज कौम कि रहबरी के चोले मे लिपटे लोग मुसलमानों की रहबरी कर रहे है, या वोट की तिजारत कर रहे है। ताअज्जुब की बात है कि ऐसा शर्मनाक मशविरा देने वाले लोग कैसे भूल गये कि यह वही बीजेपी, पीएम नरेंदर मोदी और मोदी सरकार है जो शरियत में खुली दखल अन्दाजी करते हुये शरीयत को मिटाने के मिशन पर है। क्या तौसीफ रजा की अहमियत शरियते रसूल से ऊपर है ? अगर बात तौसीफ रज़ा खां की मुश्किल कुशाई करने वाले संतोष गंगवार की मुखालफत ना करने की तक की होती तब किसी हद तक समझ में आती लेकिन यहां तो बात इस्लाम शरियत मुसलमान को मिटाने की कोशिश में दिन रात एक करने वाली पार्टी की है जिसे शायद कोई भी ईमानवाला जिन्दा जमीर मुसलमान मान ही नहीं पायेगा।

Thursday, 12 May 2016

वक्त की जरूरत है तौकीर का कदम


हरम की पासबानी  सिर्फ  सजदों से नहीं होगी,
कि खाके करबला कुछ  और ही आवाज़ देती है।


(इमरान नियाज़ी)
आईएमसी मुखिया तोकीर रजा खां ने हाल ही में एक बड़ा फैसला लिया जोकि देर से ही सही मगर हालात की जरूरत के मुताबिक बहुत ही अच्छा कदम है। इसकी जिसनी भी तारीफ की जाये कम ही है। कयोंकि यही एक रास्ता है जिसपर चलकर इस्लाम, मसाजिद और मुसलमान के वजूद को बचाया जा सकता है फिरका परस्ती काफी हद तक लेकर डूब चुकी है और वह दिन भी दूर नहीं रह गया जब मुसलमानों में आपसी फिरका परस्ती दुनिया ओर खासतौर पर हिन्दोस्तान से इस्लाम, मसाजिद और मुसलमान को नामों निशान मिट जायेगा। सबसे पहले यह बताना जरूरी समझता हूं कि मेरे इन ख्यालात को पढ़कर कोई मुझे तौकीर रजा खा का सपोर्टर न समझे मैं तोकीर रजा खां के कुछेक फैसलों के लिए तौकीर रजा खा का कट्टर विरोधी हूं लेकिन जहां बात इस्लाम और मुसलमान के दुश्मन आतंकियों का मुकाबला करने के लिए उठाये गये इस कदम की है तो इसमें तोकीर रजा खां के साथ हूं। तौकीर रजा खां के इस कदम का विरोध करने वालों को सबसे पहले तारीखे इस्लाम देखना चाहिये कि जब नबीए करीम (सल्ल0) ने वक्त की जरूरत के हिसाब से अब्दुल्ला बिन उबबी का भी साथ लिया था तो आज अगर इस्लाम और मुसलमान के वजूद की हिफाजत के लिए वहाबी देवबन्दी का साथ लिया जाये तो इसमें गलत क्या है। जो लोग तोकीर रजा खां की मुखालफत कर रहे हैं उनसे एक छोटा सा सवाल पूछना चाहूंगा कि 2002 में जब गुजरात में आतंकियों ने बेकसूर मुसलमानों का कत्लेआम किया जिन्दा जलाया आबरूऐं लूटी, असम में आतंवादियों ने मुसलमानों का कत्लेआम किया, म्यांमार में आतंकियों ने मुसलमानों का कत्लेआम किया, कश्मीर में अकसर दो चार मुसलमानों को मारा जाता है, दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी बुश ने अफगानिस्तान ओर इराक में मुसलमानों का कत्लेआम किया, अमरीकी आतंक ने सीरिया, ईरान वगैराह में लाखों में मुसलमानों को कत्लेआम किया और कर रहे है आजतक किसी ने भी किसी भी मुसलमान को मारने से पहले पूछा क्या कि तू वहाबी देवबन्दी है या सुन्नी ? कभी कोई नहीं पूछता सिर्फ मुसलमान होना ही काफी होता है कत्ल करने के लिए। तो फिर हम क्यों नहीं सिर्फ मुसलमान बनकर ही दुश्मनों का मुकाबला करते। अगर बात करें तौकीर रजा खां के इस कदम की तो एक बहुत ही कड़वा सच कि चन्द दिन पहले की बात है जब शियाओं से हाथ मिलाया गया था तब कहां थे फतवे क्यों नहीं लगाये गये थे फतवे? तौकीर रजा खां ने जो कदम उठाया है वो वक्त की जरूरत और हालात का तकाजा है इस वक्त जरूरत है आपसी फिरका परस्ती को दरकिनार करके सिर्फ मुसलमान नाम पर एक प्लेटफार्म पर आना होगा, हमारा कहना है कि आपको वहाबी देवबन्दी वगैरा से रिश्तेदारी नहीं करनी न करो उनके साथ नमाज नहीं पढ़नी न पढ़ो, उनके साथ बिजनैस नहीं करना मत करो लेकिन इस्लाम ओर मुसलमान का वजूद ही मिटा देने की कोशिश करने वालों के मुकाबले एक होकर रहो। एक छोटी सी मिसाल के तोर पर आप कुरआन पाक लेकर किसी वहाबी देवबन्दी के पास जाईये ओर उससे कहिये कि यह कुरआन है लो ओर इसकी बेअदबी करो, तो क्या वह करेगा ? किसी कीमत पर नहीं करेगा बल्कि आपपर हमलावर हो जायेगा, मर जायेगा या मार देगा लेकिन कुरआन की बेअदबी नहीं करेगा न करने देगा। ओर यही बात आप किसी गैर इस्लाम (सभी नहीं सिर्फ इस्लाम दुश्मन) से कहे तो वो खुश होकर कुरआन की बेअदबी करेगा ओर आपको दोस्त भी मानेगा, तो खुद सोचिये कि ज्यादा खतरनाक कौन है, कुरआन के बेअदबी के लिए खुशी से तैयार होने वाला या आपके कुरआन के लिए आपसे ही लड़ने को तैयार हो जाने वाला ?ै इन सब चीजों को मद्देनजर रखकर खुद ही सोचिये कि क्या तौकीर रजा खा का यह फैसला सही नही है ? दुनिया भर में इस्लाम को मिटाने की पूरी कोशिशें की जा रही है हिन्दोस्तान में तो सरकारें तक इस्लाम को मिटाने के लिए सरकारी पावर को इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकतीं, इस्लाम दुश्मनों की कोशिशों को पूरी मदद देने के लिए आरएसएस पोषित रंगबिरंगे अखबार और चैनल काम पर लगे हैं सबूत के तौर पर ताजा मामलों को ही देखिये जेएनयू मामले में फर्जी वीडियो का दिखाया जाना, दिल्ली में 12 मुसलमान लड़कों को पकड़कर आतंकी घोषित करने की चाल चली गयी मीडियाई दल्लों ने तुरन्त ही 12 आतंकी गिरफ्तार कहकर खबर प्रसारित करनी शुरू करदी साथ ही दूसरे सभी मामलों की तरह इन बारह लड़को की जीवनियां भी सुना डाली, खुदा का शुक्र कि साजिश पूरी तरह कामयाब नहीं हो सकी और कुछ को छोड़ना पड़ा लेकिन कुछ मीडियाई दल्लों ने तौकीर रजा खां के कदम को लेकर लिखी खबर में भी आतंकी शाकिर ही लिखा, बेशर्म सम्पादकों के हौसले इतने बुलन्द हो चुके है कि वे अब खुद ही जज बन गये जिन्हे खुफिया एजेसिंयों ने बेकसूर पाकर छोड़ दिया उसी बेकसूर शाकिर को सम्पादक आतंकी लिख रहा है। इस्लाम को मिटाने की मुहिम में सब के सब एक जुट होकर लगे है चाहे वह हिन्दू धर्म से तआल्लुक रखता हो या इसाई धर्म से, यहूदी हो या पारसी। लेकिन हम मुसलमान सुन्नी वहाबी देवबन्दी और यहां तककि सुन्नी और रजवी के खेमों में बटे रहने में ही अपनी बढ़ाई तलाश रहे हैं। तौकीर रजा खां की इस खबर के बाद अजीबो गरीब तरह की बयानबाजी हो रही है लगता है कि इस्लाम और मुसलमान के वजूद की फिक्र है ही नहीं किसी को। तारीखे इस्लाम उठाकर देखिये दुनिया के सबसे बड़े रहम दिल आका नबीए करीम (सल्ल0) जिन्होंने हर हर जानदार चीज पर रहम किया पेड़ों को काटने तकसे मना फरमाया लेकिन जब जरूरत पड़ी तो हाथ में तलवार भी उठाई, इस्लाम की हिफाजत के लिए अपने बच्चों तक की कुर्बानियां दीं तो क्या आज हम उसी इस्लाम की हिफाजत के लिए अपनी अना को नहीं छोड़ सकते ? क्योंकि कुरआन का भी कुछ ऐसा ही हुक्म है कि ‘‘ हालात के हिसाब से जिस कौम ने अपने अन्दर तब्दीली नहीं की वो कोम तबाह हो गयी श्श् । तारीख में ऐसे हजारों सबूत मौजूद हैं कि इस्लाम और कोम की हिफाजत के लिए बड़े बड़े नागवार फैसले भी लिए गये। फिलहाल हालात का तकाज़ा और वक्त का फतवा चीख चीखकर कह रहा है कि तौकीर रजा खां के इस कदम में अगर उनका साथ नही देना तो ना दें तो कम से कम उनकीं टांग खिचाई भी न की जाये। वैसे भी कई भगवा आतंकियों ने कई बार साफ कहा है कि मुसलमानों को मिटाने के लिए उनमें सुन्नी वहाबी की दरार को बढ़ाते रहना ही काफी है, इसलिए तौकीर की मुखालफत करने वालों को हालात और वक्त की नजाकत समझना होगा ओर इस्लाम, मुसलमान के वजूद को बचाने के लिए अना को छोड़ना होगा, कहीं ऐसा न हो कि अना के लिए दीन ही कुरबान हो जाये।
शायर ने पहले ही कहा है कि:-

अब अपने काबे की खुद हिफाजत करनी है
अब अबाबीलों का लशकर नहीं आने वाला।

Sunday, 21 February 2016

खुलने लगी इस्लाम के खिलाफ मीडिया की साजिशें


                                                      (इमरान नियाज़ी)
इस्लाम और मुसलमान को तरह तरह से आतंकित करने की साजिशों में मीडिया का अहम रोल रहा है। पहले आतंकवाद के नाम पर फिर लड़कियों को आगे रखकर और फिर गायों को मोहरा बनाकर आरएसएस व अमेरिका ने मुसलमान को आतंकित करने में कसर नहीं छोड़ी। अमेरिका व आरएसएस के इस्लाम मिटाओं अभियान में भारतीय रंग बिरंगी मीडिया का अहम किरदार रहा है। मामला चाहे मालेगांव धमाकों का हो या मक्का मस्जिद उड़ाने की कोशिश का, बात चाहे समझौता एक्सप्रेस उड़ाने की साजिश की हो या अजमेर दरगाह की, बम्बई धमाके हो या दिल्ली हाईकोर्ट धमाके हर बार धमाके की आवाज से पहले ही आरएसएस लाबी की मीडिया जिम्मेदारों के नामों की घोषणाये करने लगती है दिल्ली हाईकोर्ट गेट धमाके के मामले में तो एक चैनल ने हद ही कर दी थी कि चैनल के पास ईमेल भी आने लगी थी, मानों जैसे धमाके करने वालों के पास किसी सरकारी एजेंसी का ईमेल एडरेस नही था या फिर दूसरे मीडिया कार्यालयों का भी ईमेल एडरेस नहीं था, बस कथित चैनल का ही ईमेल आईडी थी, हमने उसी वक्त कहा था कि ये मेल सिर्फ साजिश है। यह और बात है कि मुसलमान और इस्लाम के खिलाफ की जाने वाली साजिशों के सामने आने के बाद हिन्दुस्तान कानून सहम कर मुंह छिपाकर बैठ जाता है मामला चाहे बाबरी पर आतंक बरपाने का हो या गोधरा में साजिश रचकर गुजरात भर में बेगुनाह मुसलमानों पर आतंकी हमले करने का हो, कई कई बार जांचों में सच्चाई सामने आने के बावजूद कानून साजिश कर्ताओं के नाम सुनकर कांप जाता है। किसी भी मामले को उठाकर देखिये, जब जब मुसलमान के खिलाफ साजिश बेनकाब हुई है तब तब कानून दुम दबा गया। चाहे वह साजिश गोधरा में की गयी हो या उ0प्र0 के नोएडा में पकड़े गये इण्डियन मुजाहिदीन नाम से काम करने वाले असल आतंकियों को डाक्टर से रंगदारी वसूलते हुए रंगे हाथों पकड़े जाने की हो। किसी भी मामले को आगे नहीं बढ़ाया जाता। बात करें मीडिया के हाथों हो रही मुसलमान और इस्लाम के खिलाफ साजिशों की, मीडिया इस्लाम ओर मुसलमान को बदनाम करने में बढ़चढ़ कर काम करती नजर आ रही है। किसी भी मुसलमान को पकड़कर सुरक्षा एजेंसियां आतंकी बता देती हैं तुरन्त ही आरएसएस पोषित मीडिया ऊपर नीचे का जोर लगा देती है आतंकी मशहूर करने में जबकि आतंकी असीमानन्द, प्रज्ञा ठाकुर ओर उसके गैंग के सभी आतंकियों को साध्वी, स्वामी ही लिखा व बोला जाता है। कुछ ही दिन पहले पंजाब के दीनापुर में पुलिस थाने पर हमले के नाम पर मीडिया ने ऊपर नीचे का जोर लगाकर इल्जाम मुसलमानों के सिर थोपने की कोशिश की लेकिन सिर्फ हफ्ता भर में ही मीडिया की नीच साजिश बेनकाब हो गयी ओर साफ हो गया कि हमलावरों में एक भी मुसलमान नहीं था। जब सच सामने आया तो मीडिया दुम दबा गयी ठीक वैसे ही जैसे कि मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह, समझौता एक्सप्रेस, नांदेड, गोरखपुर, बनारस, कानपुर, बम्बई की लोकल ट्रेन, घाटकोपर बस, मामलों में मुस्लिमों के नामों को उछालने वाली आरएसएस पोषित मीडिया मामलों की सच्चाई (आतंकी असीमानन्द, आतंकी प्रज्ञा ठाकुर, आतंकी कर्नल श्रीकांत, आतंकी इंद्रेष कुमार, आतंकी देवेंद्र गुप्ता, आतंकी सुनील जोशी, आतंकी संदीप डांगे, आतंकी रामचंद्र कलसांगरा उर्फ रामजी, आतंकी शिवम धाकड, आतंकी लोकेश शर्मा, आतंकी समंदर, आदित्यनाथ. आतंकी राजकोंडवार, आतंकी भूपेन्द्र सिंह छावड़ा और राजीव मिश्रा के नाम सामने आने पर डरी हुई कुतिया की तरह दुम दबाकर छिप गयी। गौरतलब बात तो यह है कि इन सभी मामलों में असल आतंकियों के नाम सामने आने से पहले बड़ी बड़ी जानकारियों से भरी कहानियां मीडिया ने प्रसारित की, और जब असल आतंकियों के नाम सामने आये तो मैया मर गयी मीडिया की। बिहार के महाबोद्धि ब्लास्ट मामले में भी आरएसएस पोषित मीडिया ने नाचना शुरू किया लेकिन जल्दी ही सच्चाई ने सामने आकर पत्रकार नामी गुण्डों का मुंह काला कर दिया। गुजरी साल नोयडा में आरएसएस और मीडिया के बनाये संगठन आईएम के असल आतंकी डाक्टर से उगाही करते रंगे हाथों पकड़े गये पुलिस ने तो मामला रफा दफा किया ही साथ ही रंग बिरंगे अखबार व साजिश करके खबरें बनाकर चीखने वाले चैनलों की औकात सामने आ गयी। हाल ही में बरेली से पकड़ लिये गये मुस्लिम नौजवानों की बाबत भी कहानियों का पिटारा खोल रखा है, दो साल पहले पाकिस्तान से दो-ढाई सौ घुसपैठिये भारत आये जोकि आजतक सरकारी महमान बनाकर रखे जा रहे हैं जिनमें एक पाकिस्तान सरकार में मंत्री भी था, हर वक्त पाकिस्तान का रोना रोने वाली मीडिया के कोई मिर्ची नहीं लगी। बम्बई ताज होटल मामले में मीडिया पूरी तरह नंगी होकर नाची। दो साल से लगातार बर्मा में आतंकी बेगुनाह मुसलमानों का कत्लेआम कर रहे हैं रंगबिरंगे अखबार और नम्बर वन होने का दावा करने वाले चैनलों की दुमे दबी हैं आसाम आतंकियों ने मुसलमानों का कत्लेआम किया किसी में गूदा नही था इन खबरों को छापने या दिखाने का। गुजरात आतंक को दंगा कहा जाता है, आसाम, छत्तीसगढ़, बंगाल, झारखण्ड, बिहार, यहां तक कि नैपाल के आतंकियों को आतंकी की बजाये माओवादी और नकसलवादी बताया जाता है। हाल ही में पठानकोट मामले में भी आरएसएस पोषित मीडिया कहानी पर कहानी पेश कर रही है। हाल ही में यूके के प्रधान मंत्री डेविड कैमरून ने बाहरी महिलाओं को अंग्रेजी बोलना न आने पर उनके देश वापिस भेजने की बात कही थी इसे आरएसएस पोषित भारतीय मीडिया ने  "मुस्लिम महिलाओं" लिखकर साम्प्रदायिक रंग दिया। अभी रूड़की में चार मुस्लिमों को पकड़कर आतंकी बता दिया मीडिया ने भी उछलना शुरू कर दिया अन्तरयामी मीडिया को पकड़ लिये गये चारों व्यक्तियों के दिमागों में चलने वाले प्लानों के सपने भी आने लगे तरह तरह की कहानियां पेश की जाने लगीं। दरअसल सिमी, इण्डियन मुजाहिदीन, लश्करे तैबा, जैसे नामों के साथ मुसलमान और इस्लाम को आतंकी साबित करने की कोशिशें तो नाकारा साबित हुई, कुछ संगठनों के असल कारिन्दों को शहीद हेमन्त करकरे ने बेनकाब कर दिया तो आईएम के असली दो कारिन्दें गुजरे साल उत्तर प्रदेश के नोयडा में एक डाक्टर से रंगदारी वसूलते पकड़े गये, तो वहां से आईएम का नाम भी पीछे कर दिया गया। मीडिया में खबर नहीं आई। अब इस्लाम व मुस्लिम दुश्मनों के दिमागों ने एक नया नाम "आईएसआईएस" की उपज की है। अब इस नई उपज के सहारे इस्लाम व मुस्लिम मिटाने की मुहिम को चलाने की कोशिशें की जाने लगीं। इसी प्लानिंग के तहत इस्लाम दुश्मनों ने बहुत सी वीडियो फुटेज भी सोशल मीडिया में वायरल की जिसमें लोगों की गर्दनें काटते दिखाया गया। ये फुटेज अमरीकी कारसाजों ने तैयार की थी। असल में किसी का गला कटा ही नहीं, इन्हीं फुटेज के सहारे अमरीका ने आईएस नाम की उपज करके अरब देशों पर आतंकी हमले शुरू कर दिये, साथ आरएसएस लाबी को भी उकसा दिया अब आरएसएस पोषित मीडिया आईएम, अलकायदा, लश्करे तैबा वगैरा की स्पेलिंग ही भूल गयी बस आईएस याद करली है। अब हाल यह है कि किसी के घर बच्चे ने जन्म लिया तो आईएस ने किया किसी को बुखार हो गया तो वो भी आईएस ने कर दिया। आये दिन मीडिया में खबरें आती है कि  ष्कश्मीर में पाकिस्तानी झण्डे लगाये गये पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाये गयेष्। क्या इन खबरों में बाल बराबर भी सच्चाई होती है इसका जीता जागता सबूत है गुजरे दिनों दौसा में एक पत्रकार नामक जाहिल ने इस्लामी झण्डे को पाकिस्तानी झण्डा बताते हुए माहोल खराब कर दिया। दरअसल पाकिस्तान तो सिर्फ एक बहाना है असल दुश्मनी तो मुसलमान से है अगर मामला पाकिस्तान से ही एलर्जी को होता तो लगभग तीन साल पहले पाकिस्तान से आये ढाई सौ से ज्यादा आतंकियों को जिनमें एक पाकिस्तान का मंत्री भी रहा था को आजतक सरकारी महमान बनाकर न पाला जाता होता किसी को भी आजतक वापिस नही भेजा गया जबकि गुजरे बीस साल के अर्से में उन हजारों महिलाओं को उनके छोटे छोटे बच्चों तक को छोड़कर वापिस पाकिस्तान भेज दिया गया जिन्होंने बीस पच्चीस साल पहले भारत आकर यहां के लोगों से शादियां करली थी और आराम से अपने परिवार के साथ रह रही थी, उन्हें भारत से जाने पर मजबूर कर दिया गया कयोंकि वे मुसलमान थीं। आरएसएस लाबी की मीडिया आजतक चुप्पी साधे हुए है। इसी हफ्ते बनारस में एक नेता का भतीजा सेना की वर्दी में पकड़ा गया उसके पासे से काफी बम बारूद बरामद हुआ, पुलिस बम बारूद पी गयी, आरएसएस पोषित मीडिया को भी सांप सूंघ गया, राजस्थान में पूर्व मेजर का पुत्र भारी मात्रा में बारूद के साथ पकड़ा गया जोकि सीरियल ब्लास्ट करने की फिराक में था, इसको आतंकी की उपाधी देने का गूदा ही नही रहा मीडिया में। गुजरे हफ्ते राजिस्थान में तीन लोग जासूसी करते रंगेहाथ पकड़े गये इनको किसी भी अखबार या चैनल ने आतंकी नहीं बोला क्यों ? कयोंकि ये तीनों गददार मुस्लिम नही है। दरअसल रंगबिरंगे मोटे मोटे अखबार और खुद को नम्बर वन कहने वाले चैनल आरएसएस लाबी में हैं और आरएसएस के लिए ही काम करते हैं इनको सिर्फ एक ही उददेश्य है कि किसी भी तरह मुसलमान ओर इस्लाम को आतंकी घोषित कर दिया जाये। एक ओर सबूत देखिये, यहकि इन दिनों आरएसएस पोषित मीडिया ने लव जिहाद नामक नयी साजिश शुरू करदी है जिसमें व्हाटसअप का सहारा लेकर अंजाम दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि यह मुस्लिम कर रहे है। क्या सबूत है कि मुस्लिम ही कर रहे हैं ? अगर मोबाइल नम्बर को सबूत मानते हो तो कोई भी मोबाइल नम्बर किसी की आईडी प्रमाणित नही करता, कि मोबाइल धारक अपने ही नाम का सिम इस्तेमाल कर रहा है या किसी दूसरे के नाम का ? हमारे पास ऐसे हजारों सबूत मौजूद हैं मोबाइल धारक को खुद नही मालूम कि वह किसके नाम की सिम इस्तेमाल कर रहा है। गुजरे हफ्ते ही उ0 प्र0 के शाहजहांपुर में फर्जी आईडी बनाकर उनके नाम पर सिम बेचने वाला गिरोह पकड़ा गया जिनमें एक आईडिया का फ्रैंचाइज भी है। आजकल जेएनयू के बहाने जमकर भड़ास निकालने के लिए नीचे तक का जोर लगाती दिखाई पड़ रही है आरएसएस पोषित मीडिया। जेएनयू में साजिश के तहत देश विरोधी नारे लगवाये गये ऐसी खबरें भी सबूत सामने आई हैं जिनसे यह साबित हो गया कि देश विरोधी नारे एबीवीपी ने लगाये, लेकिन इस सच्चाई को मीडिया दबाते हुए अफजल गुरू की बर्सी मनाने वालों को ही उछाल रही है, जिस वीडियों के सहारे जेएनयू से लेकर विदेशों तक को हिलाकर रख दिया उस वीडियो में वीडिया की असल आवाज को हटाकर अपने मतलब वाली दूसरी आवाज (देश विरोधी नारे) मिक्स करके बखेड़ा खड़ा किया गया। यह तो कहिये खुदा का शुक्र रहा कि जेएनयू में इंसाफ की आवाज उठाने वाले नेता मुस्लिम नहीं है वरना तो अब तक उनको मारकर मुठभेड़ का नाटक भी रचकर आतंकी बता दिया गया होता। कहां सो गया कानून कहां सो रहे वह जज साहब जिन्हें अकबरउद्दीन के बोलने पर यू ट्यूब देखने का शौक हो जाता है, अब क्यों नहीं देख रहे इन चैनलों की करतूत? देश से विदेश तक आग लगाने वाले इन चैनलों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत क्यों नहीं कर पा रहा कानून? हालांकि अब सरकार (गृहमंत्रालय) खुद ही अपने मकसद की तरफ बढ़ने लगा अब कहा जा रहा है कि देश विरोधी नारे कन्हैया ने नहीं लगाये अब नाम उमर खालिद का उछाला जा रहा है। मीडिया लंगूरी कुलांचे मारने लगी उमर खालिद के नाम पर, दो दिन में ही यह भी सबूत मिल गये कि आरएसएस के इस चैनल ने वीडियो मिक्स कराकर पेश की यानी अब यह भी साबित हो ही गया कि इसमें उमर खालिद का भी कोई रोल नहीं था। याद करिये गुजरे हफ्ते ही आरएसएस के एक युवक ने तिरंगा जलाया इस खबर को सुर्खियों में लाना तो दूर मीडिया खबरे छापने और दिखाने के नाम पर भी दुम दबा गयी, क्यों जी तिरंगा जलाना राष्ट्रद्रोह में नहीं आता। इस्लाम और मुसलमान को आतंकी घोषित करने के लिए अमरीका और आरएसएस का सबसे मजबूत और कारगर हथियार मीडिया और खासतौर पर भारतीय मीडिया है जो मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ गैर मुस्लिमों भड़काकर अमरीका व आरएसएस की साजिशों में मदद देने के लिए उकसाती है। मीडिया का अपनी साजिशों में कामयाब होने की कुछ खास वजह है। पहली यहकि मुसलमानों को अपना कोई न्यूज चैनल या अखबार नहीं है जो एक दो अखबार हैं भी तो वे उर्दू के हैं जिनकी प्रसार संख्या मामूली है साथ ही जहां आज खुद मुसलमानों में ही उर्दू पढ़ने वालों के गिनती नाम मात्र है तो दूसरे मजहब के लोगो से उम्मीद कैसे की जा सकती है उर्दू पढ़ने की, ऐसे में अगर किसी उर्दू अखबार में कुछ सच्चाई आती भी है तो उसे पढ़ेगा कौन ? जो एक दो अखबार है भी तो उनकी आमदनी इतनी नही होती कि वो रंगीन चमक धमक के साथ छापे जा सके। दूसरी वजह यह है कि मेरी कौम भैंसा खाती है तो खोपड़ी भी भैंसे वाली ही हो गयी है, मुसलमानों को रंग बिरंगे फोटो और ज्यादा से ज्यादा रद्दी देने वाले अखबार ही पसन्द है और ऐसे सभी अखबार और चैनल आरएसएस लाबी के ही है। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या आरएसएस लाबी के इन अखबारों में मुसलमान पत्रकार नहीं है तो जनाब है लेकिन उनके जमीर मरे हुए हैं वे सबसे पहले आरएसएस की साजिशों में हां में हां मिलाने खड़े होते हैं। आप आरएसएस लाबी के किसी भी अखबार को उठाकर देखिये उसमें ज्यादा विज्ञापन मुसलमानों के ही मिलेंगे, क्या यही विज्ञापन मुस्लिम अखबारों को नहीं दिये जा सकते, नहीं देंगे क्योंकि पहली बात मुस्लिमों के दैनिक अखबार हैं ही नहीं और दो चार हैं भी तो वो रंगबिरंगे नहीं है और ना ही उनमें इतने पेज होते हैं कि रद्दी का वजन हो। कुछ साल पहले की ही बात है बरेली के एक मुस्लिम नेता ने यह कहते हुए बरेली के ही एक कांग्रेसी अखबार की शाहदाना चैराहा पर प्रतियां जलाई कि यह अखबार मुस्लिमों के खिलाफ साजिशी खबरें दे रहा है, अच्छा किया लेकिन शर्म की बात तो यह है कि इन्हीं नेता ने तीन दिन बाद ही अपनी पार्टी का 34 हजार रूपये मूल्य का विज्ञापन बरेली के ही उस अखबार को दिया जो कि खुला आरएसएस का है। क्यों नेता जी मुसलमानों के ठेकेदार बनते हो और आरएसएस को बिजनेस देते हो क्या बरेली में मुस्लिम अखबार नहीं हैं अगर बहाना करते हो प्रसार संख्या और रंगबिरंगे होने का तो सोचो जितना बिजनेस आरएसएस पोषित अखबारों को देते हो उसका आधा भी मुस्लिम अखबारों को देने लगो तो चन्द दिनों में वो भी तुम्हारे रंगबिरंगे फोटो छापने लगेंगे। मुसलमान और इस्लाम को बदनाम करने की आरएसएस पोषित मीडिया की साजिश का नया सबूत जेएनयू का मामला ही है। कश्मीर में फोज जिसे चाहा मार दिया मीडिया तुरन्त मुठभेड़ बता देती है, याद कीजिये गुजरे साल 2011-12 में फौजियों ने एक मंदबुद्धी नौजवान को बेवजह ही मारकर आतंकी कहकर मुठभेड़ कह दिया था आरएसएस पोषित मीडिया नंगी होकर नाचने लगी लेकिन जब अगले ही दिन सच्चाई उजागर हो गयी तो मीडिया की मैया मर गयी सब डरी सहमी कुतिया की तरह दुम दबा गये। मन्दिर टूटे तो ष्मन्दिर तोड़ा गयाष् और जब मस्जिद या मजार तोड़ा जाता है तो पहले तो खबर ही बड़ी ही मुश्किल से मजबूर होकर लगाते है और तब हैडिंग होता है ष्धर्मस्थल टूट गयाष्। मन्दिर टूटने पर लोगों की आस्था को भड़काने की कोशिश की जाती है। आज यानी 20 फरवरी 2016 का ही एक जीता जागता सबूत देखिये। बरेली जिले के थाना शाही की पुलिस चोकी दुनका पर चोकी इंचार्ज और सिपाही के बीच उगाही को लेकर फोन पर कहा सुनी गाली गलौंच हुई। मामला यह था कि दुनका के एक कसाई ने घर में ही भैंस काटली सिपाही पहुंचा और पैसा मांगने लगा न देने पर वह कसाई को पकड़ लिया, इसपर सैकड़ों लोगों ने चोकी घेर ली इसपर चोकी प्रभारी ने सिपाही को डांट डपक की, चोकी इंचार्ज ने कई बार साफ साफ कहा कि ये लोग रसूक वाले और बवालिये, और मुझे चोकी में पुलिस को पिटवाना नहीं है, तुम फोरन वहां से चले आओ। इस खबर को आज कुछ स्थानीय व बाहरी अखबारों ने गौकशी का हैडिंग देकर लोगो को चोकी इंचार्ज के खिलाफ भड़काने की कोशिश की, क्योंकि चोकी इंचार्ज मुसलमान है। हम यह नही कह रहे कि चोकी इंचार्ज दूध का धुला है या बेकसूर है लेकिन आरएसएस पोषित अखबारों ने उगाही को धार्मिक रंग देने में कसर नही छोड़ी। घर में जानवर काटने पर उगाही न देने का मामला था जिसे अखबार वालों ने गोवंशीय पशु लिखकर आग लगाने की कोशिश की, ठीक उसी तरह जैसे कुछ ही दिन पहले राजिस्थान के दौसा में इस्लामी झण्डे को पाकिस्तानी झण्डा लिखकर एक पत्रकार बने फिरने वाले एक गुण्डे ने इलाके में हड़कम्प मचा दिया था, बरेली में भी कोशिश की गयी। जिस मोबाइल रिकार्डिंग के सहारे मीडिया आग आग लगाना चाहती है उसमें गौवंशीय पशु का एक बार भी नाम नहीं आया। लेकिन आरएसएस पोषित अखबारों को मोका मिला मुसलमान के खिलाफ हवा बनाने का।

Friday, 10 July 2015

अब गाय के बहाने साजिशें


बम धमाकों करके मुसलमानों को फंसाने सताने की कोशिशों के बाद लड़कियों को मोहरा बनाकर साजिशें रची गयी उसमें भी कामयाबी न मिलने के बाद अब गाय के बहाने साजिशें शुरू कर दी गयी। हाल ही में मध्य प्रदेश के निम्बाहेड़ा में मुस्लिम लड़को को फंसाने के लिए आरएसएस ने बछड़े का सिर काटकर मन्दिर में डाल दिया और आरएसएस लाबी की पुलिस ने कुछ ही देर बाद इलाके के मुस्लिमों पर आतंक बरपाना शुरू कर दिया। देश भर में बम धमाके कर करके सैकड़ों बेगुनाह मुसलमानों को फंसाने की कोशिशों को कुछ हद तक शहीद हेमन्त करकरे ने फ्लाप कर दिया, उस नेक दिल इंसान ने अपने इमान का सोदा न करके देश में किये जा रहे धमाकों के मामलों में दूध का दूध पानी का पानी कर दिया, यह अलग बात है कि इकलौते इमानदार जांच अधिकारी को उसकी ईमानदारी की सजा भी आरएसएस ने जल्दी ही देदी। महान है अदालतों के नाम से मशहूर देश के फैसला कक्ष और व्यक्ति के धर्म, जाति, हैसियत, पावर, के हिसाब से काम करने वाले धर्म निर्पेक्षता के फर्जी लेबल में छिपा धर्माधारित कानून जिसने शहीद हेमन्त के असल कातिलों को तलाशने की कोशिश नहीं की, जो आरएसएस लाबी ने कहानी तैयार करके देदी उसी पर दौड़ गये देश के फैसला कक्ष (अदालतें)। बम धमाके कर करके मुस्लिमों को आतंकी घोषित करने की कोशिशों के बाद अपनी लड़कियों को मोहरा बनाकर मुसलमानों पर आतंक बरपाना शुरू किया लेकिन इसमें भी मुंह की ही खानी पड़ी, इनकी तमामतर बहन बेटियों ने साफ कर दिया कि उनके साथ कोई फरेब या धोका नही हुआ बल्कि वे खुद पूरे होशो हवास के साथ अपने प्रेमी के साथ आई है इस्लाम कबूल किया है। मामला चाहे मेरठ मदरसे को लेकर उछाला गया हो या बिहार और गोरखपुर में रचा गया हो, यह अलग बात है कि शुरू में लड़कियों को डरा धमकाकर उनसे ब्यान कराये गये हो इन झूठे ब्यानों को कराने और उछालने में पुलिस का बड़ा रोल रहा, पुलिस ने ब्यान लिये ब्यान लेने से पहले लड़कियों को जेल में महीनों सड़ने जैसे खौफ दिलाये फिर मनचाहे ब्यान लिखकर उन्हें उछाल दिया। जबकि ऐसे संवेदनशील मामलों में ब्यानों को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है लेकिन आरएसएस लाबी की पुलिस ने कानून का मुंह काला करते हुए फिजा बिगाड़ने की कोशिशें की। जबकि सच्चाई ये थीं कि सभी लड़कियां अपनी मर्जी से अपने प्रेमियों के साथ रह रही थीं। अपनी लड़कियों को मोहरा बनाकर मुस्लिम दुश्मनी भी फेल हो गयी तो अब नया मोहरा पकड़ा गाय। अब गायों उनके बच्चों को खुद काट काटकर मुस्लिमों को फंसाने की साजिशों की शुरूआत कर दी गयी है। अभी हाल में ही मध्य प्रदेश के निम्बाहेड़ा में एक आतंकी ने गाय के बछड़े का सिर काट कर मन्दिर के दरवाजे पर डाल दिया आरएसएस के इशारे पर इलाकाई पुलिस ने सीधे सीधें पांच मुस्लिम युवको को पकड़कर उनपर जमकर जुल्म ढाने शुरू कर दिये, भला हो उन हिन्दू भाईयों का जिन्होंने आरएसएस के सरकारी व गैरसरकारी गुण्डों की धमकियों को दरकिनार करके खुलेआम सच्चाई जाहिर करदी और ड्रामा रचने वाले आरएसएस कार्यकर्ता जीवन भामी को बेनकाब कर दिया, ऊधर न चाहते हुए भी पुलिस को जीवन भामी को हिरासत में लेना पड़ा। बस फिर क्या था कुछ घझटे पहले तक कुलांचे मारने वाले अपनी साजिश की पोल खुलते ही दुबक गये बिलों में। इसी तरह चार दिन पहले गुजरात के टापी जिले के एक इलाके में एक बरवार जाति के घर गाय का बछड़ा मर गया जिसे उसने करीब में ही सड़क किनार फेंक दिया कुछ ही टाईम बाद कुत्ते उसे खींचकर बाजार तक ले आये, बस मिल गया आतंकियों को मुसलमानों को आतंकित करने का मौका, गौरतलब बात यह है कि टापी का एसपी भी आरएसएस लाबी का ही है उसने इलाके में जाकर ऊपर नीचे का जोर लगाया कि यह मामला मुसलमानों पर लाद दिया जाये लेकिन हिन्दोस्तान में सभी आतंक के साथ नहीं है इसलिए जिसका बछड़ा था उसने ओर उसके आसपास के लोगों के साथ ही बाजार के कुछ दुकानदारों ने गुजरात के सरकारी आतंकी के बहकाने डराने धमकाने के बावजूद मामले को मुस्लिमों पर थोपने की एसपी की चाल को नाकाम कर दिया और सच को ही रहने दिया, इसी बीच दिल्ली से एक आतंकी ने एसपी नायक को फोन किया जिसमें उसने आतंक मचाने का चैलैंज देते हुए एसपी को 24 घण्टे का टाईम दिया इस पर एसपी गिड़गिड़ाने लगा और कहने लगा कि "उन कुत्तों (मुसलमानों) ने किया होता तो मैं उन्हें घर से खींच खींचकर....... करता।", एसपी ने अपनी बातचीत में अपनी सच्चाई कबूलते हुए कहां कि  "सूरत का मामला देखों, कैसे मैंने एके 47 से फायरिंग करके भूना" उसने फोन करने वाले आतंकी से यह भी कहा कि  "सर जी किसी को पता न लगे कि मैं आरएसएस का आदमी हूं।" इससे यह तो साफ हो गया कि गुजरात में अभी भी सरकारी तौर पर भी मुसलमानों के खिलाफ आतंक चल रहा है। हाल ही में उ0 प्र0 के महोबा में गाय के बछड़े को या तो कहीं चोट लगी या फिर गुण्डों ने खुद उसे जख्मी करके उसके बहाने जमकर आतंक फैलाया और मुसलमानों की दर्जनों दुकानों को आग लगादी, यह आतंक पुलिस की मिली भगत से किया गया, सीओ समेत भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मुसलमानों पर आतंकी हमला किया गया। गुजरी 30 जून को उ0प्र0 के शामली में एक गुण्डे ने पहले अपने घर वालों से चुराकर गाय का बछड़ा बेच दिया फिर घर वालों से बचने और अपनी पुरानी रंजिश निकालने के लिए एक बछड़ा चोरी का आरोप लगाकर इलाके के गुण्डों के साथ मिलकर मुस्लिम युवक पर हमला कर दिया।
आरएसएस लाबी के साथ साथ आरएसएस के टुकड़ों पर पल रहे सरकारी अमले का आतंक दिन बा दिन बढ़ता ही जा रहा है। और हो भी क्यों नहीं सभी जानते है कि अब कोई दूसरा हेमन्त करकरे नहीं आने वाला और रही बात अदालत नामी इमारतों की तो वे भी आरएसएस को खुश रखने में लगी नजर आ रही है सबूत के लिए अफजल गुरू का मामले में सुप्रीम कोर्ट के वाक्य और उसके बावजूद अफजल गुरू को कत्ल करा दिया जाना ही काफी है। यही वजह है कि मुसलमान के खिलाफ कोई भी आतंकी आसानी से कुछ भी बोल देता है कुछ भी कर देता है। ईवीएम के चमत्कार से मोदी सरकार बनने के साथ ही आतंकियों के अच्छे दिन आने लगे। फेसबुक, व्हाट्सअप जैसी सोशल मीडिया साईटों पर जमकर आतंकी धमकियां और गुण्डई की छूट रहती है
अकबर ओवैसी बोलता है तो जज साहब को यूट्यूब देखने का शौक हो जाता है लेकिन देश में धमाके करने वाले बोलते है तो बेचारे जज साहब इन्टरनेट चलाना भूल जाते है। हम बात कर रहे थे गौ-वंश हत्या की, तो सबसे पहले तो यह जानने जरूरी है कि जो मुसलमान गाय खाते है क्या उनको इस्लाम इसकी इजाजत देता है ? भारत में गाय कानून और हिन्दू समुदाय की नजर से बचाकर काटी जाती है जोकि पूरी तरह से चोरी है। इस्लाम में चोरी की कतई इजाजत नहीं, चोरी किसी की भी हो चाहे किसी इंसान की हो या कानून, समाज की। इस्लाम में चोरी को हराम करार दिया गया है और इस्लामी कानून के मुताबिक हिन्दोस्तान की सरहदों के अन्दर गाय खाना कतई हराम
है, इसलिए गाय काटने खाने वालों को सख्त से सख्त सजा बल्कि सजाये मोत दिया जाना चाहिये। कानूनन गाय का काटा जाना तो हमेशा से जुर्म था लेकिन गौ रक्षा के बहाने सिर्फ मुस्लिम व्यापारियों को लूटने उनपर आतंक बरपाने का फार्मूला गुजरे कुछ साल से शुरू हुआ ओर इसे शुरू किया भाजपा के टिकट पर उ0प्र0 के पीलीभीत से सांसद चुने जाने के बाद मेनका गांधी ने। गाय हिन्दू धर्म में पूजी जाती है इसकी हिफाजत करना जरूरी है अगर लोग इसकी हिफाजत की बात करते तो बहुत ही ठीक करते, लेकिन यहां तो सिर्फ मुस्लिम व्यापारियों को लूटने, मुसलमानों पर आतंक बरपाने के लिए ही गाय का प्यार और सम्मान हो रहा है पूरे देश में देखा जाता है कि गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों पर आतंक बरपाने वाले ही गायों पालते हैं सुबह को दूध निकालकर छोड़ देते हैं दो चार रूपये का दाना घास बेचारी बेजुबान को नहीं खिलाते। बेजुबान जानवर बेचारी क्या करे कैसे जिये कौन भरे उसका पेट। समझ नहीं आता कि ये कैसे गौमाता के पुत्र हैं जो अपनी माता को घर में रखकर नही पालते, कैसे पुजारी है जो पूज्य की सेवा नही करते, उसे गन्दगी खाकर जीने के लिए छोड़ देते हैं, जरा भी शर्म नही आती इन गौ-भक्तों को। क्या दूध निकालने तक का ही प्रेम है। दरअसल कोई सच्चा गौभक्त है ही नही सारी गौभक्ति, सारा गौ प्रेम सिर्फ मुसलमानों पर आतंक बरपाने के लिए ही है।