Monday, 7 January 2013

फ्लाप होता "लक्ष्य 2014"



समाजवादी पार्टी का आगामी लोकसभा चुनावों में उ0प्र0 के गुजरे विधानसभा चुनावों जैसा प्रदर्शन करने के सपनों को लेकर "लक्ष्य 2014" अभी से पूरी तरह फ्लाप होता नजर आ रहा है। उ0प्र0 के गुजरे विधानसभा चुनावों में सपा ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सीटें जीतकर अपने बलबते पर सूबे की सरकार बनाली। दरअसल सूबे की गुलाम जनता ने सपा की अपेक्षा अखिलेश यादव में ज्यादा सपने देखे थे लेकिन विडम्बना यह रही कि गुलामों के सपने एक एक करके टूटकर बिखरने लगे। दरअसल अखिलेश यादव अपने पिता सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के किये कार्यों को ही दोहराने में समय गुजार रहे हैं यानी वहीं पुराने फार्मूले 'बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्याधन, वगैरा के साथ ही मायावती के किये कार्यो को पलटने में समय जाया किया जा रहा है। साथ हाल ही अखिलेश यादव ने बरेली से आबिद खां नामक व्यक्ति को "राज्य एकीकरण परिषद का उपाध्यक्ष" बना दिया यानी आंख मूंदकर लाल बत्ती थमा दी। इसी तरह फार्मूला पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी आजमाकर देखा था, क्या हुआ ? माया ने लालबत्ती थमाने के बाद गोपनीय समीक्षा कराई तो पता चला कि 50 वोट भी नहीं बढ़े साथ ही कुर्सी का किराया भी नहीं मिल रहा था आखिरकार वापिस करली गयी। अब अखिलेश यादव ने भी माया के नक्शे कदम पर ही पैर रख दिया। खैर फिलहाल तो सूबे की गुलाम जनता से वसूला गया पैसा मुख्यमंत्री की ही सम्पत्ति है जैसे चाहें जहां चाहें इस्तेमाल करें या जिसे चाहें मोटा रोजगार देदें इसमें गुलाम जनता की औकात नहीं कि एतराज का मुंह खोल सके। बात है किसी को लालबत्ती देने का उद्देश्य कया है ? मुख्यमंत्री का क्या उद्देश्य है या वे उनके सपने कितने साकार होंगे। सूबे की गुलाम जनता को तो आजतक किसी से कोई फायदा हुआ ही नहीं इसलिए गुलामों के भले की उम्मीद करना ही बेकार की बात है। लेकिन मुख्यमंत्री के इस कदम से खुद मुख्यमंत्री या उनकी पार्टी को क्या फायदा होगा या किस फायदे की उम्मीद पर यह फैसला किया है यह विचार का विषय है। अगर अखिलेश यादव को लगता है कि सपा को मिलने वाले मुस्लिम वोटों में भारी इजाफा होगा तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल कही जायेगी या फिर ‘ मुगंरी लाल के सुन्हरे सपने कहे जा सकते हैं ’, क्योंकि वोट दर में हजार पांच सौ से ज्यादा इजाफा नहीं होने वाला साथ यह भी ध्यान में रखने वाली बात है कि अगर मुख्यमंत्री के इस कदम से सपा के खाते में हजार-पांच सौ वोट बढ़ेंगे तो दो-चार हजार वोट कम होना भी तय है, क्योंकि इस मामले को बारीकी से देखना होगा। अखिलेश यादव ने सिर्फ दरगाह की वजह से ही यह कदम उठाया है यानी मायावती की तरह ही अखिलेश यादव का भी मानना है कि दरगाह से जुड़े किसी व्याक्ति को कुर्सी दे देने से सारा मुस्लिम वोट सपा के खाते में चला जायेगा तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। मुख्यमंत्री या सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को यह नही भूलना चाहिये कि ये मुसलमान हैं इनमें आपसी ( धार्मिक मान्यता ) मतभेद सबसे ऊपरी सतह पर रहता है और इसे कोई मिटा नहीं सकता। मुसलमान के आपसी मतभेद इस तरह हैं जैसे कि बहती दरिया के दोनों किनारे, जो कभी एक नहीं हो सकते। इस कारण यह साफ है कि अगर मुस्लिम वोटों में इजाफे की उम्मीद पर यह फैसला लिया है तो फिर मुख्यमंत्री को हजारों की तादाद में मुस्लिम वोट खोने के लिए तैयार रहना होगा, हम तो यहां तक कह सकते हैं कि सीटों का नुकसान बर्दाश्त करने को तैयार रहना होगा। मुख्यमंत्री को यह अच्छी तरह याद रखना होगा कि तमाम मुसलमान एक साथ ही उनके साथ नहीं आ सकते, इसलिए किसी एक ग्रुप को साध लेने से ही काम नहीं चलता, दूसरी सच्चाई यह भी जान लेना जरूरी है कि व्यक्तिगत रूप से भी उस व्यक्ति को अच्छे पैमाने पर लोकप्रिय होना भी जरूरी है। अगर मुख्यमंत्री यह समझते हैं कि दरगाह से जुड़े किसी शख्स को कुर्सी थमा देने से ही सारा मुस्लिम वोट एक प्लेटफार्म पर आ जायेगा तो यह सिर्फ सुन्हरा सपना ही है, सबूत के तौर पर देंखें कि दरगाह के ही मन्नान रजा ने खुद भी लोकसभा चुनाव लड़ा और जमानत जब्त करा दी। दरगाह के ही तौकीर रजा ने अपनी पार्टी को लोकसभा चुनावों में उतारा दूसरी सीटें तो बड़ी बात बरेली लोकसभा सीट पर भी जमानत जब्त हो गयी। मन्नान रजा ने इसी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को समर्थन का एलान किया इसका नतीजा सबके सामने है, मतलब यह कि अगर दरगाह से जुड़े लोगों को भी दरगाह के सम्मान के बराबर माना जाने लगे तो यह सिर्फ नासमझी ही कहलायेगी क्योंकि दरगाह के सम्मान के बराबरी किसी को नहीं दी जा सकती। हां अगर दरगाह वालों की बात हो तो इसमें कोई शक नहीं कि तमाम मुसलमान आंख मूंदकर उनके इशारे पर चलने को तैयार को तैयार हो जाता। लेकिन दरगाह से जुड़े किसी भी शख्स को वैसा सम्मान या मान्यता हासिल नहीं है। 
आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा के मजबूत होकर उभरने की मजबूत उम्मीद पाई जा रही है। इसका सीधा और इकलौता कारण हैं कांग्रेस की करतूतों से गुलाम जनता की ऊब जाना। कांग्रेस से ऊब जाने के बाद मुस्लिम वोटों के सामने सपा और बसपा ही विकल्प बचते हैं बसपा को कई बार मुसलमानों ने सरकार तक पहुंचाया लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने सरकार में आने के बाद मुसलमानों को कुछ देने की बजाये सिर्फ अपने अपनों को ही रेवडि़यां बांटी, आखिरकार मुसलमान ने मायावती से मुंह मोड़ लिया ओर नतीजा मायावती सड़क पर आ गयी। एक दो बार ऐसा ही कुछ मुलायम सिंह यादव ने भी किया था तो मुस्लिमों ने उन्हें भी सत्ता से बाहर कर दिया था लेकिन इसबार अखिलेश यादव से कुछ उम्मीद की थी लेकिन मुसमानों की बदकिस्मती यह रही कि उनकी यह उम्मीद भी चकनाचूर होती नज़र आ रही है। अब इन हालात में आगामी लोकसभा 2014 चुनावों में मुसलमानों के सामने कांग्रेस, सपा, बसपा का विकल्प ही नही बचता दिख रहा है। जाहिर है मुस्लिम वोट मतदान से दूरी बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं दिख रहा, और अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को ही होना है।
इन हालात को सामने रखकर ही कोई फैसला लें तब ही आगामी चुनावों में कुछ हासिल कर सकते हैं मुख्यमंत्री या सपा मुखिया को ना चाहकर भी कुछ कड़े फैसले करने होंगे। कुछ ऐसे भी कदम उठाने होंगे जो उन्हें पसन्द नही हों या फिर ऐसे फैसले जिनकी उनकी नजर में कोई वैल्यू न हो।

Saturday, 5 January 2013

भड़काकर कत्लेआम कराने वाले से डरता कानून


इन दिनों अमरीका व गुजरात आतंक के एजेण्टों के निशाने पर आंन्ध्र प्रदेश मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन के विधायक श्री अकबर उद्दीन ओवैसी हैं। अभी तक सोनिया गांधी नामक रिमोट से चलने वाली केन्द्र की आरएसएस एजेण्ट कांग्रेस बाहुल्य मनमोहन सिंह सरकार ने मुंह नहीं खोला है अभी सिर्फ आतंक एजेण्ट ही बन्दर कूदी भर रहे है लेकिन क्योंकि ये कूदिया मनमोहन सिंह सरकार को गदगद करने वाली है तो जल्दी ही सरकार भी मुस्लिम दुश्मनी की इस कूदियां में शामिल होगी। दरअसल अकबर उददीन ओवैसी को साफ और सच बात करने की बीमारी है और अगर यह बीमारी किसी मुसलमान को हो तो यह हमारे महान देश के धर्मनिर्पेक्षता के लेबल में छिपे धार्मिक कानून को बर्दाश्त नहीं होता। हजारों की तादाद में मुसलमान आतंकियों का शिकार बने और इसकी निन्दा हो यह भी धर्मनिर्पेक्षता के लबादे में लिपटा धार्मिक कानून केसे बर्दाश्त करे। 2002 में गोधरा में मुसलमानों के खिलाफ बड़ी साजिश रचकर और फिर हिन्दुओं की भावनाओं को भड़काकर सूबे भी में सरकार व गैरसरकारी आतंकियों के हाथो हजारों बेकसूर मासूम मुसलमानों का कत्लेआम कराया गया इसपर कानून गदगद होता रहा। और तो और मुसलमानों के कत्लेआम कराने वाले को सम्मान व पुरूस्कार देने के साथ साथ सिंहासन पर बने रहने का अभयदान भी दिया गया। इस मामले में राष्ट्रीय या अन्तराष्ट्रीय मानवाधिकार भी दुम दबाये नजर आये और न ही किसी भी सम्बन्धित न्यायालय ने इस मामले को स्वतः ही संज्ञान में लेने का कष्ट किया। साथ ही मीडिया के वे धड़े जो अमरीका व गुजरात पोषित हैं आतंकियों के हाथों किये जा रहे कत्लेआम को दबाने की कोशिश में लगे रहे और अगर कोई छोटी मोटी खबर लिखी भी तो उसे दंगे का नाम दिया और आजतक दंगा ही लिखा जा रहा है। कुछ दिन पहले की ही बात है कि  बरमा व आसाम में आतंकी मुसलमानों का कत्लेआम कर रहे थे तब भी मीडिया के आतंक परस्त धड़े दुम दबाने में लगे रहे। विदेशी मीडिया के जरिये बरमा व आसाम में हो रहे आतंकी हमलों की खबरें गुलाम जनता तक पहुंची तो इसपर निन्दा और टिप्पणियां होना स्वभाविक था। बेकसूर मुसलमानों का कत्लेआम हो और उसकी कोई निन्दा करे यह आरएसएस एजेण्ट कांग्रेस की केन्द्र सरकार को कैसे गवारा होता। बरमा और आसाम में आतंकियों की करतूतों को कथित मीडिया धड़ों ने दबाये रखने के साथ साथ इसकी निन्दाओं को भी दबाने का प्रयास किया इस हालात में सोशल नेटवर्किंग साईटें ही एक इकलौता जरिया थी अपनी बात को समाज दुनिया तक पहुंचाने का। लोगों ने फेसबुक समेत कई सोशल नेटवर्किंग साईटों पर अपनी निन्दा व अफसोस दुनिया तक पहुंचाया, मुसलमानों के कत्लेआम पर निन्दायें कांग्रेस की सरकार कैसे बर्दाश्त करती। सबसे पहले प्रधानमंत्री को ही मुस्लिम पक्ष में हो रही निन्दाओं से तकलीफ पहुंची, प्रधानमंत्री ने फेसबुक समेत उन सभी सोशल मीडिया साईटों को बन्द करने की बात कहने के साथ कोशिश भी की। एक कहावत है कि ‘‘ बड़ें मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुबान अल्लाह ’’ यह कहावत सार्थक करी केन्द्रीय गृह सचिव ने। गृह सचिव ने तो आवेश में आकर बड़ा ही अजीब और गैर जिम्मेदाराना बयान देते हुए कह दिया था कि ‘‘ यह पाकिस्तानी साजिश है ’’ यानी गृहसचिव ने बरमा ओर आसाम के कत्लेआम को ही झुठलाने की कोशिश की लेकिन उनकी बदकिस्मती से उसी दिन ‘‘ बीबीसी ’’ आसाम आतंकियों की एक और दिल दहला देने वाली करतूत उजागर कर दी। (देखें-anyayvivechaknews.blogspot.in पर 25 अगस्त 2012 का ‘‘ क्या यह भी पाकिस्तानी साजिश है गृहसचिव जी ’’ हमारा लेख) मुस्लिम कत्लेआम की खबरों को सोशल नेटवर्किंग साईटों पर दौड़ना आरएसएस एजेण्ट कांग्रेस की केन्द सरकार को इतना चुभा कि इन साईटों को बन्द करने के लिए भी हाथ पैर फेंके लेकिन गुजरे तीन महीने से उसी फेसबुक पर अमरीका व गुजरात आतंकी एजेण्टों ने मीडिया से जुड़े नामों से अकाउण्ट बनाकर रोज मुसलमानों और इस्लाम के खिलाफ अपने गन्दे खून की पहचान कराने के साथ साथ मुसलमानों के खिलाफ हिन्दू समाज को बड़े ही घृणित शब्दों में भड़काने में लगें है लेकिन यह बात  तीन महीने से भी ज्यादा अर्सा गुजर जाने के बावजूद न तो हमारे प्रधानमंत्री को चुभी और न ही इसमें गृहसचिव को कोई साजिश दिख रही। आज आन्ध्र प्रदेश के विधायक श्री अकबर उददीन ओवेसी ने जरा सी बात कहदी वह भी सही बात उसमें कोई भड़काऊ बात नहीं थी तो उसपर सब ही कूदियां मारने लगे, बेवजह की खुराफात पैदा की जा रही है कोई अदालत जा रहा है तो कोई पुलिस थाने। समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा कया तूफान आ गया ओवैसी के बयान से ? भड़काने का काम तो देश में लगभग सभी करते है गुजरात में तो भड़काकर मुसलमानों का कत्लेआम तक कराया गया उस समय किसी को तकलीफ नही हुई क्योंकि मोदी, ठाकरे, उमाभारती, अशोक सिंघल समेत सभी विहिप, संघ, आरएसएस केलोग हैं और उससे भी बड़ी बात यह है कि ये सारे ही मुसलमान नहीं हैं और इन्होंने मुसलमानों के खिलाफ भड़काया और गुजरात में तो मुसलमानों पर आतंकी हमले तक करा दिये गये। इनके खिलाफ किसी की जुर्रत नहीं हुई कि अदालत जाये या पुलिस में जाता। कयोंकि ओवैसी मुसलमान हैं तो उनकी बात को ही भड़काऊ भाषण के नाम से बदनाम किया जा रहा है। ऊधर मीडिया के अमरीका व गुजरात पोषित धड़े ओवैसी के खिलाफ माहोल तैयार करने में जुट गये हैं।
जहां तक ओवैसी के भाषण को भड़काऊ कहे जाने की बात तो उन्होंने न तो अपने भाषण में मुसलमानों को दूसरों को कत्लेआम करने के लिए भड़काया जैसे कि मोदी ने किया था और न ही देश को बर्बाद करने की धमकियां दी जैसे कि बाल ठाकरे ने हमेशा दीं। ओवैसी ने तो सिर्फ एक बात कही वह भी देश के कानून और सरकारों की कारगुजारियों को खोला, ओवैसी ने किसी को भड़काने की बात नहीं की न ही ‘‘ देश बर्बाद हो जायेगा ’’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जैसे कि दूसरे हमेशा करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। ओवैसी ने किसी धर्म के लिए अपमानित शब्दों का प्रयोग भी नहीं किया जैसा कि फेसबुक पर कुछ आतंकी मुसलमान ओर इस्लाम के लिए कर रहे हैं। चलिये मान लेते हैं कि ओवैसी ने भड़काने की कोशिश की तो ठीक है ओवैसी के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिये लेकिन उससे पहले उन सभी के खिलाफ भी ऐसी ही कार्यवाही करनी होगी जो हमेशा से ही लोगों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काते रहे हैं और मोदी के खिलाफ तो भड़काकर तीन हजार से ज्यादा बेकसूर अमन पसन्द शरीफ लोगों की हत्या का भी मामला चलाना होगा। हम अच्छी तरह जानते है कि इतनी दम किसी भी माई के लाल में नहीं। इनकी सारी ताकत और नेतागीरी और कानून सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ ही बोलने और साजिशें करने तक सीमित है। और कम से कम केन्द्र में सोनिया रिमोट से चलने वाली आरएसएस के दूसरे रूप कांग्रेस की सरकार है। याद दिलादें कि हम उसी मनमोहन सिंह सरकार की बात कर रहे हैं जिसने तीन हजार से ज्यादा बेकसूर मुसलमानों के कत्लेआम पर खुश होकर गुजरात आतंक के मास्टर माइण्ड को सम्मान व पुरूस्कार दिया था, और आजतक अभयदान बादस्तूर जारी है।

Thursday, 3 January 2013

पूरी अकीदत से मनाया चेहेल्लुमे हुसैन (अलै0)


नवासाये रसूले कौनैन आका इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों की शहादत के 40वें दिन अकीदत मन्द शहीदाने करबला का चेहेल्लुम करते है। आज चेहेल्लुम था। अहलेबैत से सच्ची मोहब्बत ओर उनपर इमान रखने वाले मुसलमानों ने पूरी अकीदत और अहतराम के साथ इमाम का चेहेल्लुम किया। इस मौके पर शिया और सुन्नी अपने अपने रिवायती तरीके से रस्में अदा करके नियाज नजर करते हैं।
बरेली में भी आज चेहेल्लुम किया गया। इस मौके पर शियाओं का एक परम्परागत मातमी जुलूस स्वालेनगर स्थित छोटी करबला तक गया।

Tuesday, 1 January 2013

2002 के आतंक के खौफ और कांग्रेस से नफरत का नतीजा है मोदी की जीत-इमरान नियाजी


गुजरात में तीसरी बार मोदी को कुर्सी मिलने को लेकर मीडिया और मुस्लिम विरोधी बड़े ही खुश नजर आ रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि मानों यह जीत मोदी की शख्सियत की जीत हो। जबकि सच यह है कि यह जीत और 2007 के चुनावों की जीत मोदी की लोकप्रियता की जीत नही बल्कि 2002 में गोधरा में मुसलमानों के खिलाफ साजिश रचकर गुजरात भर में मुसलमानों पर मोदी के सरकारी व गैरसरकारी आतंकियों द्वारा किये गये कत्लेआम को फिर दोहराये जाने का खौफ दिखाकर मुसलमानों को मोदी के पक्ष में मतदान करने के लिए मजबूर करके हासिल की गयी जीत है। इस जीत की इतनी वावैला किया जाना फिजूल समय बर्बाद करने के सिवा कुछ नहीं। इस बार मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में भी भाजपा प्रत्याशियों की जीत इस बात का साफ सबूत है कि जिस गुजरात में मोदी ने अपने सरकारी व गैरसरकारी आतंकियों के हाथों तीन हजार से ज्यादा बेगुनाह मुसलमानों को बेदर्दी से कत्लेआम करायाए पूरे पूरे परिवार जिन्दा जलवा दिये मासूम अबलाओं की आबरूऐं लुटवाई, उस समय मोदी के आतंकियों के हाथों कत्ल होने से जो मुसलमान बच गये वे क्या अपनी खुशी से गुजरात आतंकवाद के मास्टर माइण्ड मोदी को वोट देंगे? कभी नहीं। मगर आतंक  को दोहराने का खौफ दिखाकर कुछ भी करने के लिए मजबूर किया जा सकता है जिस तरह इस बार गुजरात विधानसभा चुनावों में मुसलमानों को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए मजबूर किया गया। इसी तरह मोदी की सभाओं में भी मुसलमानों को सरकारी बन्दूकों के बल पर बुलाया जाता है और अपनी जय जयकार कराई जाती है। वरना जिनके परिवारों खानदानों के लोगों को बेरहमी से कत्ल किया गया जिन्दा जलाया गया वे किस दिन से मोदी को वोट देगें। गुजरात आतंक को दोहराने की बात सुनकर गुजरात का मुसलमान कांप उठता है फिर इनसे जो कहा जाता है बेचारे वही करीते है वह चाहे मोदी की सभाओं में आकर मोदी के गुणगान करना हो या मोदी को वोट देना। 2002 में मोदी के सरकारी व गैरसरकारी आतंकियों के हाथों अपना सब कुछ लुटाये बैठे गुजरात के मुसलमान इस समय मोदी व मोदी के सरकार व गैरसरकारी आतंकियों के इशारे पर नाचने को मजबूर हैं। 2002 के आतंकी हमले को करीब से देख चुके या उसमें अपना सब कुछ गंवा चुके गुजरात के मुसलमानों ने आतंकी हमले को दोहराये जाने से बचने के लिए मजबूरन मोदी को वोट दिया। मोदी की जीत पर अमरीका व गुजरात पोषित कुछ मीडिया धड़ों ने मोदी को भगवान ही बना डाला मोदी के नाम को ही देव मंत्र की जगह इस्तेमाल कर दिया।
गुजरात के मुसलमानों द्वारा मोदी को वोट दिये जाने की एक और बड़ी वजह यह है कि मोदी के मुकाबले में एक बड़ी पार्टी सिर्फ कांग्रेस ही थी। जी हां वहीं कांग्रेस जो सोनिया गांधी उपासक और आरएसएस की एजेंण्ट है। वही कांग्रेस जिसकी सरकार ने 2002 में गुजरात में आतंकियों के हाथों कत्ल किये गये हजारों बेगुनाह मासूम मुसलमानों की लाशों पर जश्न मनाते हुए आतंकियों के मास्टर माइण्ड को सम्मान व पुरूस्कार देकर अपने आरएसएस नामक भगवान को खुश किया। गुजरात में आतंकी हमले के समय तो सोनिया उपासक कांग्रेस औकात पर थी लेकिन जल्दी ही देश का शरीफ व अमन पसन्द मतदाता एक बार फिर सोनया के धडि़याली आसुंओं का शिकार हो गया और झांसे में आकर हमेशा से ही मुसलमानों के साथ गद्दारी करती रहने वाली कांग्रेस को औकात से उठाकर केन्द्र की सरकार में ला खड़ा किया। बस कांग्रेस को इसी मौके का इन्तेजार था, क्योंकि गुजरात आतंकी हमले के दौरान तो कांग्रेस की औकात ही नहीं थी कि हजारों बेगुनाह मुसलमानों के कत्लेआम पर जश्न मनाती, सरकार में आते ही कांग्रेस ने सबसे पहले अपने आरएसएस के आकाओं को खुश करने के लिए गुजरात आतंक के मास्टर माइण्ड को सम्मान और पुरूस्कार दिया। देश का बंटवारा, महाराष्ट्र में मुस्लिमों के कत्लेआम, बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाकर उसमें मूर्तियां रखवाने, बाबरी मस्जिद में पूजा शुरू कराने, बाबरी ढहाने की साजिश रचने और गुजरात आतंक के मास्टर माइण्ड को सम्मान देने जैसी कांग्रेस की गद्दारियों को देखने के बाद खुद को मुसलमान बताने वाले कुछेक दलालों को छोड़कर तमाम मुसलमान कांगे्रस का साथ देकर अपना ईमान खराब नही करना चाहता, कांग्रेस की गद्दारियों की ही वजह है कि गुजरे उ0प्र0 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस औकात पर ही रही और गुजरात विधानसभा चुनावों में भी मुस्लिम वोट गुजरात आतंक के मास्टर माइण्ड के मुकाबले में भी कांग्रेस को नही मिला।
इन सब हालात को जानने के बाद कैसे कहा जा सकता है कि मोदी की यह जीत मोदी की लोकप्रियता की कारण हुई। मोदी की यह जीत गुजरात आतंक को दोहराने का खौफ दिखाकर और अमरीका व आरएसएस एजेण्ट कांग्रेस की मुसलमान से गददारियों का नतीजा है इसलिए इस जीत पर अमरीका व गुजरात पोषित मीडिया समेत दूसरों का भी उछलना बेकार ही है।

अब डूब मरें मदर्सो को गलत बताने वाले


 मदर्सो के खिलाफ बकवास करके अपने गन्दे खून की पहचान कराने वाले अब शर्म से कहीं अपना मुंह काला करलें। मदर्साें को आतंकी अड्डे बताने वाले अमरीका व गुजरात के एजेण्ट आतंकी गैंग के लोग देखें कि मदर्सों में इस्लामी कानून चलता है और इस्लामी कानून ही दुनिया का इकलौता कानून है जो किसी के ओहदे, ताकत, पहुंच या हैसियत को देखे बिना ही इंसाफ करता रहा है और बुराई को जड़ से मिटा सकता है। विश्व प्रख्यात इस्लामी मदरसे दारुल उलूम देवबंद ने अपने छात्रों के कैमरे वाले मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है और यहां छात्रावास से 14 ऐसे मोबाइल बरामद किए। मदरसे के उपकुलपति मौलाना अब्दुल खलीक ने यहां बताया कि छात्रों को आगाह किया गया कि अगर भविष्य में उन्हें कैमरा वाले मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते पाया गया तो अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। खलीक ने कहा कि छात्रों को बिना कैमरा वाले मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना होगा ताकि उनके दिमाग पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़े।

Saturday, 29 December 2012

तब तो आधा देश खाली हो जायेगा-इमरान नियाज़ी


         देश की राजधानी में हुए परम्मपरागत कार्य बस बालात्कार के बाद दिल्ली व केन्द्र की सरकारों समेत दूसरे राजनैतिक दल बलात्कार पर फांसी की सज़ा का प्रावधान होने की मांग करते दिख रहे हैं। बड़ी ही अजीब और चैकाने वाली बात यह है कि यह मांग गुलाम जनता करे तो समझ में आता है लेकिन अगर कोई खददरधारी बलात्कार बलात्कार, अपहरण, कत्ल, सम्पत्ति कबजाने जैसे मामलों में फोसी की सज़ा के प्रावधान की बात करे तो अटपटा सा लगना स्वभाविक ही है। अगर एक दो नाम छोड़ दें तो देश के खददरधारी बलात्कार, अपहरण, कत्ल, घोटालों वगैरा में महारत हासिल करने के बाद ही विधायक, सांसद या मंत्री की कुर्सी तक पहुंचता है लगभग सभी इन महान उपाधियों के धारक हैं और कुछ तो आज भी बादस्तूर अपनी महारत को ताजा रखने के आदी हैं। शायद ही कोई ऐसा खददरधारी हो जिसने ये कार्य न किये हो, खासतौर पर बलात्कार। बलात्कार तो बलात्कार है वह चाहे चाकू बन्दूक की नोक पर किया गया हो या अपने पद और पहुंच के झांसे में लेकर किया गया हो या फिर सुरक्षा वर्दी के बल पर किया जाता हो। या गुजरात में आतंकियों ने किये और कराये हों, आखिर होते तो बलात्कार ही हैं। दिल्ली बस रेप काण्ड के बाद जहां गुलाम जनता सड़को पर आकर फांसी के प्रावधान की मांग कर रही है वहीं संसद में बैठे लोग भी फांसी की मांग करने लगे। बलात्कार की सजा फांसी हो यह मांग गुलाम हिनेस्तानी कर रहे हैं तो बात समझ में आती है लेकिन देश के खददरधारी या वर्दीधारी यह मांग करें तो बात हजम नहीं होती। ऐसी क्या मजबूरी है कि लोग अपनी ही करतूतों के खिलाफ ही कड़े कानून वह भी फांसी की सजा की मांग कर रहें हैं। दिल्ली बस गैंगरेप में ही ऐसी क्या खास बात है कि संसद से सड़क तक सभी बलात्कार की सजा फांसी की मांग करने लगे। बलात्कार तो बलात्कार है। कोई करे, कहीं करे, किसी से करे। जुर्म तो बराबर ही है। आज दिल्ली बस गैंगरेप को लेकर मालिक और गुलाम सभी चीखते दिख रहे हैं लेकिन कल जब गुजरात में आतंकियों ने दर्जनों मासूमों को बलात्कार का शिकार बनाया, कश्मीर में अकसर सुरक्षा बलों के लोग मासूमों का बलात्कार करते रहते हैं, मणिपुर में भी वर्दीधारी बलात्कार करते हैं। किसी की आवाज नहीं निकली, किसी ने आज तक फांसी तो बड़ी बात गिरफ्तारी तक की मांग नहीं की, क्यों ? क्या कानून सिर्फ गुलाम जनता के ही कुछ लोगों पर लागू होता है ? क्या सिर्फ दिल्ली बस काण्ड करने वालों ने ही गलत किया बाकी गुजरात कश्मीर, मणिपुर वगैरा में बलात्कार करने वाले सही हैं। उनके लिए क्यों किसी की हिम्मत नही होती फांसी की सजा की मांग करने की। आज बीजेपी कुलाचे भर रही है, गुजरात आतंकी हमले के समय तो खुद बीजेपी केन्द्र में काबिज थीक्यों नहीं देदी उन आतंकियों को फांसी ? अगर कांगे्रस की बात करें तो कांग्रेस तो उस समय ओकात पर थी लेकिन जैसे ही सरकार में पहुंची तो कांग्रेस ने सबसे पहले आतंकियों के मास्टर माइण्ड को सम्मान पुरूस्कार तो दिसया ही साथ ही अभयदान भी दिया। आज उसी कांग्रेस की सरकार बलात्कार की सजा फांसी की बात ही नही कर रही बल्कि बिल भी नचा रही है।
मांग अच्छी है और इसी तरह के सख्त कानून होना भी चाहिये। लेकिन कानून को पूरी तरह से अंधा होना चाहिये, कानून को अपराधी के पद, धर्म, उसके पहुंच या उसकी शक्ति और उसके देश को देखकर सजा या मज़ा का फैसला नहीं करना चाहिये जैसे कि भारत के दूसरे कानून करते रहे हैं। न्यायसंगत कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिये कि संसद, विधानसभाओं, परिषदों, निगमों में बैठे खददरधरियों, गुजरात, मालेगांव, दरगाह अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस हमलों के आतंकियों को दस्यों साल तक सरकारी खर्च पर पाले, सम्मान पुरूस्कार दे, हुकूमत करने में मदद करे और गुलाम जनता के किसी व्यक्ति को, उसकी नागरिकता उसके धर्म उसकी हैसियत पर हावी होकर चन्द दिनों के अन्दर ही सजा दे। अभी तक तो जितने भी कानून देखे गये हैं उनका यही हश्र होते देखा गया। मिसाल के तौर पर देखें कि 20-25 साल पहले जिन पाकिस्तानी महिलाओं ने भारत के पुरूषों से शादिया करके भारत में ही बस गयीं थी, उनके छोटे छोटे बच्चे हैं भारत के कानून ने उन्हें उनके बच्चों तक को छोड़कर देश से जाने पर मजबूर किया, वायोवृद्ध कैंसर से पीडि़त हवलदार खां को सिर्फ इसलिए बरेली में वर्षों तक सड़ाया गया उनका सही ईलाज तक नहीं कराया गया उनपर आरोप लगाया गया कि वे पाकिस्तानी है और वीजा अवधि समाप्त होने के बाद भी देश में रह रहे हैं यहां कुछ माह पहले उनकी मौत हो गयी ये सिर्फ इसलिए किया गया कि वे सभी महिलायें और स्व0 हवलदार खां मुसलमान थे जबकि इसके विपरीत गुजरे साल पाकिस्तान का एक देशद्रोही जाकि पाकिस्तान की सरकार में मंत्री था अपने देश पाकिस्तान से गददारी करने के लिए भारत आया यहां की सरकारों ने उसे सरकार महमान बनाकर रखा, उसकी वीजा अवधि की समाप्ती की कोई चिन्ता नही हुई उसे वापिस नहीं भेजा गया उसके बाद पाकिस्तान के सैकड़ों गददार इस वर्ष आये और उन्हें भी लम्बे समय से पाला जा रहा है, क्यों ? क्योंकि वे सभी हिन्दू हैं, उनपर वीजा कानून लागू नहीं होता जबकि इन पाकिस्तानी देशद्रोहियों ने भारत में ऐसी मनगंढ़तें सेनाकर भारत की शान्ति को भी पलीता लगाने की कोशिशें की। अगर बात करें आतंकवाद की तो भारत के कानून में मुसलमान एक दो गैरमुस्लिमों का कत्ल करे तो वह आतंकवादी, मुसलमान अपना हक और इंसाफ मांगे तो आतंकी लेकिन हिन्दू हजारों की संख्या में कत्लेआम करे तो वह माननीय, सम्मान व पुरूस्कार का हकदार। कस्साब ने कुछ लोगों की जाने लीं तो चन्द दिनों में ही सज़ाये मौत, कयोंकि वह मुसलमान था। आतंकी असीमानन्द, प्रज्ञा ठाकुर, विनय समेत गुजरात आतंकियों ने हजारों का कत्लेआम किया तो सम्मान व पुरूस्कार और सिंहासन, क्योंकि ये सभी मुसलमान नहीं हैं। गोधरा में की गयी साजिश की जांच नानावटी व रगंनाथ मिश्र आयोगों ने करके अपनी आख्याओं में मोदी की साजिशों को बेनकाब कर दिया, रगंनाथ मिश्र ने तो यह तक कहा था कि मोदी को हिरासत में रखकर मुकदमा चलाया जाना चाहिये। इन रिपोर्टों को मनमोहन सिंह सरकार ने दफनाकर मोदी को अभयदान जारी रखा, क्यों ? क्योंकि मोदी मुसलमान नही है यही साजिश अगर फारूख अबदुल्ला, या उमर अबदुल्ला ने की होती तो शायद वे अबतक फांसी पर झूल गये होते या कम से कम जेल में तो सड़ाये ही जा रहे होते।
अब देखिये वर्दी के सामने कानून की नामर्दी। बरेली के थाना सीबी गंज के पूर्व थानाध्यक्ष वीएस सिरोही ने एक पत्रकार परिवार से खुलेआम 20 हजार रूपये की फिरौती की मांग की इसकी शिकायतों समाचारों को पढ़ने के बावजूद सीओ से डीजीपी तक, सिटी मजिस्ट्रेट से मुख्य सचिव तक और गृहसचिव से प्रधानमंत्री तक पूरा साल गुजर जाने के बावजूद किसी की हिम्मत नही हो रही कि उसके खिलाफ मुकदमा तो दूर विभागीय कार्यवाही भी कर सके। जबकि जबकि पत्रकार को झूठा केस आजानी से बनाकर दर्ज कर दिया गया।
हमारी बात का मतलब यह नहीं कि बलात्कार के खिलाफ सख्त कानून न हो। कानून होना चाहिये। हम तो कहते हैं कि इस्लामी कानून को अपनाया जाये क्योंकि दुनिया के कानूनों में सिर्फ इस्लामी कानून ही एक ऐसा कानून है जिसके चलते अपराध होते ही नहीं अगर कोई गलती से कर भी दे तो उसकी सज़ा को देखकर दूसरे समय से पहले ही सुधर जाते हैं यह और बात है कि भारत और अमरीका के कुछ आतंकियों को इन सज़ाओं से मिर्ची लगती है।
दिल्ली बस काण्ड पर फांसी की सज़ा की मांग करने वालों से हमारा सवाल है कि सोचिये कि अगर फांसी की सज़ा का प्रावधान आया तो पार्लियामेन्ट, विधानसभाओं, निगमों, परिषदों का क्या होगा कौन बैठेगा ? सुरक्षा बलों की तादाद न के बराबर रह जायेगी। किर क्या होगा ? जाहिर है कि खददरधारी इस तरह का कानून पास नहीं कर सकते, करेंगे लेकिन इस तरह से कि उसका मर्दानगी सिर्फ गुलाम जनता तक ही होगी। खादी और वर्दी के सामने उसकी कोई औकात नहीं होगी।

Sunday, 16 December 2012

मुसलमानों की आस्तीन का सांप काग्रेस


मुसलमानों की आस्तीन का सांप काग्रेस में चल रहे वशंवाद के तहत राजा, शहनशाह और नवाब खानदानों की तरह सिंहासन के उत्तराधिकारी पुत्र दर पुत्र ही होता था ठीक उसी तरह कांगे्रस में भी चल रहा है लोकतन्त्र का नाम ही मिट चुका है। जवाहरलाल लाल के बाद इन्दिरागांधी, इन्दिरा गांधी के बाद राजीव फिर सोनिया और अब राहुल। बस एक ही परिवार का कब्जा जमा हुआ है।  बाबरी मस्जिद के मामले में गददारी करने के बाद सोनिया गांधी ने अपने घडि़याली आंसू दिखाकर मुस्लिमों को धोका दिया। इस बार राहुल ने मुसलमानों को छलने की कमर कसी है। हमेशा की तरह इस बार भी कांग्रेस ने बिकाऊ मुल्लाओं से सौदा करना शुरू कर दी है जिन से सौदा पट चुकी है वे बहकाने लगे मुस्लिम वोटों को। अब मुसलमानों को किसी के बहकावे में आने से पहले सोचना होगा कि कांग्रेस का असली रूप क्या है। कुछ बाते हम याद दिलाते हैं। मोदी, भाजपा, शिवसेना वगैरह से बढ़ी मुस्लमान की दुश्मन है कांग्रेस। मोदी ,भाजपा शिवसेना, आरएसएस आदि तो मुस्लमानो और हिन्दुस्तान की खुली दुश्मन हैं कांग्रेस। मुस्लमानो के लिए कांग्रेस आस्तीन का संाप है। और यह हर आदमी जानता है व समझता है कि सामने के हजार दुश्मन से ज़्यादा खतरनाक होता है एक गद्दार । महाभारत में भी कृष्ण ने भी यही कहा था कि हजार सैनिको से अधिक घातक होता है अपना एक गद्दार मोदी ने सामने से मुसलमानो पर आंतक बरपाया था सेना जब तब हमले करती रहती है लेकिन कंग्रेस तो वह जहरीला सांप है जिसे मुस्लमान ही दूध पिलाते हैं और वह मुसलमान को ही डसती है 2002 में गोधरा में साजिश रचकर मोदी ने अपने सरकारी व गैर सरकारी आंतकियों के हाथों हजारो बेकसूर मुस्लमानो का कत्लेआम कराया उस समय दिल्ली में अटलबिहारी का कब्ज़ा था अटल जी आंखो पैरो से बेकार थे मतलब न तो उनकी आंखे खुलती हैं और नही घुटनो से अपने बल पर खड़े हो पाते इस मजबूरी में गुजरात में आंतकियों की करतूतो का खुलकर जश्न नही मना सके सिर्फ मन ही मन में गदगद होते रहे और अपनी आंखो और पैरों की मजबूरी के चलते उछल कूद न कर सके। अगर अटल जी या उनकी सरकार गुजरात आतंकवाद पर खुशी मनाती नाचती कुदती तो यह कोई चैकाने वाली बात नही होती क्योंकि सब एक ही गैंग के थे मगर जब यही काम कोई दूसरी पार्टी या सरकार करे तो यह गौरतलब बात है वो भी वह पार्टी या उसकी सरकार जो धर्मनिरपेक्ष होने का ढोंग करती है मुसलमानो के टुकड़ो के बल पर ही जीती हो जिसे सरकार तक पहुंचाते ही मुसलमान हों तो यह चैकाने वाली बात है और इसी करतूत को आसतीन का संाप कहा जाता है मुस्लमानो ने कांग्रेस के जन्म से ही कांग्रेस का साथ दिया और कंाग्रेस ने हर बार मुस्लमान से गद्दारी ही की है। पं0 जवाहर लाल नेहरू और तत्कालीन कंाग्रेस कमेटी ने प्रस्ताव पास किया कि प्रधानमंत्री ,रक्षामंत्री,व वित्तमंत्री की कुर्सी मुस्लमान को नही दी जायेगी उस समय कांग्रेस ने अपना यह जहर न उगला होता तो आज भारत दुनिया सबसे बड़ा और ताकतवर देश होता।
सत्तर के दशक में तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री स्व0 इंदिरा गांधी ने मुफ्तियों के फतवो के बावजूद जबरन नसबन्दी का अभियान चलाया इस अभियान में छांट छांट कर मुस्लमानो की ही जबरदस्ती नसबन्दियां की गयीं इसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 1978 के आम चुनावो ने ;लोकसभा व समस्त विधान सभाद्ध कांगे्रस को औकात पर लाकर खड़ा कर दिया क्योंकि उस समय देश के मुस्लमानो ने कांग्रेस का साथ छोड ़दिया था हालत ये हो गयी थी खुद इंदिरा की भी जमानत नही बचा सकी कांग्रेस। लेकिन फुटपाथ पर आने के बाद इंदिरा गांधी ने घडि़याली आंसू बहा बहा कर मुस्लमानो के सारे मरकज़ो मे हाथ पैर जोड़ने का नाटक किया चूंकि मुस्लमान बढ़े ही दयावान और मंाफ करन वाले होते हैं इसलिए इंदिरा को मंाफ करके फिर कुर्सी दे दी इस बार कंाग्रेस कोई हरकत करती कि परेशान सरदारों ने इंदिरा गांधी को कत्ल कर दिया इसके बाद राजीव गंाधी ने कुर्सी पर बैठते ही बाबरी मस्जिद में पूजा शुरू करा दी और आ गये फुटपाथ पर। फुटपाथ पर रहते हुए राजीव गंाधी ने एक ही अच्छा काम किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ़द्वारा ईराक पर अमरीकी आतंकी हमलावरो के जहाजो के जो ईंधन दिया जा रहा था वह सख्त भाषा में रूकवा दिया इसके जवाब में अमरीका ने राजीव को मरवा दिया इसी बीच प्राधानमंत्री की कुर्सी नरसिम्हाराव के हाथ लग गयी नरसिम्हाराव ने गद्दारी और आतंक परस्ती की हदें ही पार करते हुए कल्याण से सांठगांठ करके बाबरी मस्जिद को शहीद करा दिया राव की इस करतूत के बाद मुस्लमानो एक बार फिर कंाग्रेस का साथ छोड़ दिया और कांगे्रस को औकात बात दी। इसके बाद कांग्रेस के पास काफी लम्बे वक्त तक नेहरू के परिवार का घडि़याली आंसू बहाने वाला कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीति में नही था। इसी बीच कंाग्रेसियों नें सोनिया गंाधी को बोलना सिखाया और सोनिया को सक्रिय राजनीति में प्रवेश करा दिया। फिर सेानिया ने पारिवारिक परंपरा के मुताबिक घडि़याली आंसू बहाना शुरू कर दिये सीधी साधी मुस्लमाम कौम फिर आ गयी झांसे में और कांग्रेस को औकात से उठाकर केंन्द्र की सत्ता तक पहुंचा दिया इस बार तो कांग्रेस ने गद्दारी की हदें ही तोड़ दी पिछले हर बार तो कुछ दिन सत्ता में पैर जमाने के बाद रंग बदलती थी कांग्रेस, मगर इस बार तो सरकार बनाने से पहले ही गिरगिटी रंग बदल डाले। बाबरी को शहीद कराने की साजिश के बाद लगभग पन्द्रह साल तक औकात पर रही कांग्रेस को जब पिछली बार मुस्लमानो ने इज्जतदार बनाया तो सरकार बनाते समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गंाधी ने खुद समर्थन पर बनने वाली सरकार का प्रधानमंत्री बनना पसन्द नही किया और अपनी इस सियासत को कामयाब करने के लिए बहाना किया कि अल्पसंख्यक को प्रधानमंत्री बनाना है बात अल्पसंख्यक की थी तो सोनिया के साथ ही उस समय कांग्रेस के पुराने वफादार मो0 आरिफ खां, गुलाम नबी आज़ाद, सलमान खुर्शीद ,फारूख अब्दुल्ला आदि भी खडे़ थे इन अल्पसंख्यको ंमे से कोई न दिखा सोनिया को, क्योंकि मुस्लमान को पीएम की कुर्सी न देने का फार्मूला खुद सोनिया परिवार व पार्टी का ही है। सोनिया ने बात सीधे कहना थी कि मुस्लमान के अलावा किसी को भी पीएम बनाना है खैर यह तो थी प्रधानमंत्री न बनाने की बात। सोनिया रिमोट से चलने वाली केन्द्र की कांग्रेस बाहुल्य सरकार ने मुस्लमानो के मुहं पर जो करारा तमांचा जड़ा उसके बाद तो कांग्रेस का पूरा असली रूप खुलकर सामने आ गया। 2002 में गोधरा मे साजिश रचकर नरेन्द्र मोदी ने हजारो बेगुनाह मुस्लमानो का जो कत्लेआम करया था मोदी की इस करतूत पर खुश हो रही कांग्रेस सरकार में आने के बाद अपनी खुशी को छिपा नही पाई और हजारों बेकसूर मुस्लमानो को कत्ल कराने से खुश केन्द्र की कांग्रेस बाहुल्य ;यूपीएद्ध सरकार ने नरेन्द्र मोदी को सम्मान और पुरस्कार देकर कत्लेआम पर अपनी खुशी काजश्न मनाया साथ ही पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा कराई गयी गोधरा साजिश की जांच रिर्पोट पर मोदी को बचाने के लिए उस रिर्पोट को दफ्न कर दिया 
फिलहाल मुस्लिम वोट के सौदागर मुसलमानों को अन्ना के आन्दोलन से दूर रखने की कीमत हासिल कर चुके है ओर तरह तरह से बड़गलाने में जुटे हैं। यह सच्चाई हम भी स्वीकार करते हैं कि अन्ना खुद भी मोदी के पुजारी हैं साथ ही अन्ना के साथ बीजेपी का खड़ा होना भी अन्ना की नियत और चाल को शक के दायरे में लाता है लेकिन यहंा दो खास वजह हैं जो मुस्लमानो को अन्ना के आन्दोलन में समर्थन करना चाहिये पहली यह कि इस समय सरकार कांग्रेस की है और कांग्रेस जन्म से ही मुस्लमानो की आस्तीन की संाप है इसलिए देश भर के मुस्लमानो को कांग्रेस को मिटाने की कोशिश करनी चाहिये इसके लिए चाहें मोदी के चाहने वाले अन्ना हजारे के साथ क्यों न खड़ा होना पड़े। दूसरी बात यह कि अन्ना के साथ हैं किरन बेदी यह एक ऐसा नाम और ऐसी हस्ती है जिनकी नियत पर शक किया ही नही जा सकता वोटों के सौदागरों को वक्त के तकाज़े को समझते हुए अपनी सलाह वापिस लेकर मुस्लमानो को कांग्रेस नामक सांप को दूध पिलाने से बचने की सलाह देनी चाहिए। साथ ही हर मुसलमान को सभी चुनावों के दौरान गुजरात आतंकवाद में कत्ल किये गये बेगुनाह बूढ़ो बच्चों, औरतों समेत हजारों मुसलमान लाशों को सामने रखकर फैसला करना होगा कि गुजरात में आतंकियों के हाथों किये गये मुस्लिम कत्लेआम पर खुश होकर इस आतंक व कत्लेआम के मास्टर माइण्ड को सम्मान व पुरूस्कार देने वाली कांग्रेस को वोट देने से अच्छा है कि चुपचाप घर में बैठे ओर वोट न दें। लेकिन सही तो यह है कि हर उस प्रत्याशी को वोट दिया जाये जो कांग्रेस को हराने की स्थिति में हो।